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“जिंदगी”...बदलाव की ओर एक कदम

Guest Column | 16-Aug-2016 05:51:55 PM
     
  
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पूजा श्रीवास्‍तव

ज़िंदगी एक ऐसी पहेली जिसे समझने और सुलझाने में युग बीत गए, लेकिन ये आज भी अबूझ है। हम सब जानते हैं कि हर किसी के जीने का अपना तरीका है, हर देश हर जाति और समुदाय की कुछ सांस्कृतिक पहचान होती है, लेकिन कुछ भावनाएं ऐसी होती हैं जो देश काल और स्थान के दायरे में नहीं बंधती। हमारी बोली बानी वेशभूषा तो अलग हो सकती है लेकिन हमारे सपने हमारी आकांक्षाएं और ज़िंदगी से हमारी अपेक्षाएं कमोबेश एक जैसी होती हैं। शायद यही वजह है कि राजनीतिक रुप से हमारे सबसे पुराने प्रतिद्धन्दी पाकिस्तान के धारावाहिकों को हमारे देश में हाथों हाथ लिया गया। एक साल से अधिक की यात्रा पूरी कर चुके जिंदगी चैनल ने हिन्दुस्तान के एक बड़े दर्शक वर्ग के दिल में अपनी खास जगह बना ली है।


इन धारावाहिकों की सबसे खास बात ये है कि ये बिल्कुल हमारे अपने जीवन से जुड़े हुए लगते हैं। इनके चरित्र हमारे ही जैसे दिखते हैं,हमारे जैसी बातें करते हैं। इनके घर, खान पान, इनके कपड़े सब कुछ बेहद विश्वसनीय लगते हैं। बनावट और अतिवादिता के लक्षण इनमें नहीं दिखाई देते। इनकी हर कहानी अपने आप में अनूठी है। न इनमें सास बहू के परम्परागत झगडे़ हैं न हीं न ही नायक नायिकाओं के फिल्मी लटके झटके। यहां सीधी सादी कहानियां है, सीधी सच्चे संवाद हैं। इनकी चिन्ताएं वही हैं जो आमतौर पर हमारे घरों में होती हैं। खास बात यह है कि यहां की स्त्री हमारे पूर्वानुमानों से ज़्यादा जागरूक और आधुनिक है। इतना ही नहीं, समाज में अपनी परम्परागत छवि को तोड़ने के लिए ये स्त्रियां बेहद आतुर दिखती हैं। ये स्त्रियां झूठे आदर्शवाद की कठपुतलियां नहीं बल्कि यथार्थ की सच्ची तस्वीरे हैं। इनकी जिंदगी एक जद्दोजहद है, उस समाज के खिलाफ जहां औरत तमाम बंदिशों में कैद है। हालांकि समाज से उनका यह संघर्ष बेहद सीधे तौर पर नहीं दिखाई देता। ज़्यादातर धारावाहिकों में परिवार ही उस समाज की नुमाइंदगी करते हुए दिखते हैं जहां स्त्रियां आज भी दोयम दर्ज़े की नागरिक हैं।जहां खुद को साबित करने के लिए उसे न जाने कितने इम्तिहानों से गुजरना पड़ता है।


इस सन्दर्भ में सबसे पहले नाम याद आता है बेहद लोकप्रिय धारावाहिक जिंदगी गुलजा़र है की नायिका क़शफ़ मुर्तज़ा की। क़शफ़़ एक ऐसी युवा लड़की है जिसके पिता ने दूसरी पत्नी के लिए अपनी पहली पत्नी और तीन बेटियों को छोड़ दिया है। कशफ़ इनमें सबसे बड़ी है और सबसे समझदार भी। घर का खर्चा चलाने के लिए वो अपनी मां और बहनों के साथ बच्चों को ट्यूशन देती है।अपनी आगे की पढ़ाई के लिए वो शहर की युनिवर्सिटी में दाखिला लेती है जहां उसकी मुलाकात खिलंदड़े स्वभाव के ज़ारुन से होती है जो शहर के समृद्ध परिवार का है और जो कशफ़ की परम्परागत वेशभूषा और सादगी का मज़ाक उड़ाता है। कशफ़ यहां भी अपनी हाज़िरजवाबी और कॉमन सेंस से सबको मात दे देती है। वो न केवल युनिवर्सिटी में टॉप करती है बल्कि एक बेहद सम्मानजनक पद भी प्राप्त करती है। इतना ही नहीं आगे चलकर जारुन से शादी करके वो एक अच्छी बीवी और बहू भी साबित होती है। लेकिन इस पूरे सफ़र में वो कहीं भी अपने अस्तित्व और आत्मसम्मान से कोई समझौता नहीं करती। न अपने पिता के सामने और न ही अपने पति के सामने।


क़शफ़ के चरित्र से इतर है माहम का चरित्र। मेरे कातिल मेरे दिलदार की नायिका की जिंदगी तब तक बड़े मजे से कटती है जब तक वो अपने प्रेमी से शादी करके उसके घर नहीं आ जाती है। शादी के बाद उसे पता चलता है कि जो व्यक्ति कई दिनों से उसका पीछा कर रहा है वो उसके पति का ही बड़ा भाई है। ससुराल पहुंचने पर वो लोगों की ईर्ष्‍या और षड्यन्त्र का शिकार होती है। इन सबके बीच उसका पति भी उस पर विश्वास नहीं करता। बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वो अपनी हिम्मत नहीं खोती। सबसे अपना प्रतिरोध लेने के बाद वो अकेले ही जीवन निर्वाह करने का फैसला करती है। अपनी पति की माफ़ी भी वो स्वीकार नहीं करती। कुछ ऐसी ही कहानी धारावाहिक इज़्ज़्त की भी है। बलात्कार का शिकार हुई ये लड़की अकेले ही अपना यु़द्ध लड़ती है।


यहां सिर्फ अपने आत्मविश्वास के लिए लड़ने वाली स्त्रियां ही नहीं है बल्कि जीवन को बेहतर तरीके से जीने की शिक्षा देने वाली स्त्रियां भी हैं। धूप छांव, आईना दुल्हन का, मात की नायिकाएं मितव्यतिता और परिस्थतियों के साथ तालमेल बिठा कर चलने की हिमायत करती हैं। चैनल पर कई ऐसे धारावाहिक भी देखने को मिले जो समाज की कुरीतियों अन्धविश्वास का खामियाजा भुगतती महिलाओं की कहानी कहते हैं। आज रंग है और प्यार का हक का नाम इसमें खास तौर पर लिया जा सकता है। इसी तरह के कई धारावाहिक और हैं जिनमें ऐसी मजबूत इरादों वाली स्त्रियां दिखाई देती हैं। सबकी चर्चा तो संभव नहीं है लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि पाकिस्तानी समाज भी बदलाव के लिए मचल रहा है। जड़ हो चुके मूल्यों और आधुनिकता के बीच द्वन्द वहां भी विद्यमान है।खास कर महिला वर्ग में। इस बदलाव की लहर को एक विशेष धारावाहिक में नायिका द्वारा बोले गये डॉयलॉग से समझा जा सकता है जहां वो कहती है कि हम किसी और की अमानत बन कर क्यों रहे, हमारी जिंदगी के फैसले हमारे अपने क्यों नहीं।



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