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धृतराष्ट्र के संजय नहीं हैं आज के नेता

Guest Column | 17-May-2016 02:25:20 PM
     
  
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बिलाल एम जाफ़री

मैं एक मुसलमान हूंए मगर उससे पहले एक भारतीय। व्यक्तिगत रूप से मुझे धर्म की अपेक्षा अपनी नागरिकता बताने में सदैव गर्व की अनुभूति हुई है और शायद आने वाले समय में भी होती रहे। मैंने शायद लगाया है और एक कुशल राष्ट्रवादी होने के नाते आपका मुझे शक की निगाह से देखना या मुझ पर संदेह करना लाज़मी है। आपका संदेह मुझे अचरज में नहीं डाल रहा है क्योंकि अब मुझे ऐसे सवालों की आदत सी हो गयी है। मैं जवाब दे.देकर थक चुका हूं और उकताकर एक कोने में चला गया हूं। ऊबकर एक कोने में पड़े होने का भी अपना एक अलग रस हैए ऐसा कर आप घटित घटना के दर्शक बन या तो उसपर रंज.ओ.ग़म कर सकते हैं या उसका लुत्फ़ ले सकते हैं। ध्यान रहे आपके पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं। 

बहरहाल जब देश पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते हुए दामए गिरते हुए सेंसेक्सग़ए महंगाईए हत्याओंए किसानों और छात्रों की आत्महत्याओंए सूखाए बाढ़ए बिजलीए पानी जैसे मूल मुद्दोंए छात्र आन्दोलनए छात्रों के लिए यूजीसी द्वारा समाप्तक की गयी ग्रांट के प्रमुख मुद्दों को भूल या उसे दरकिनार कर वन्दे मातरम् या भारत माता की जय को एक बेहद महत्त्वपूर्ण मुद्दा मान लें तो देश के किसी भी नागरिक की इन सभी मुद्दों पर फिक्र लाज़मी है।

अब यदि श्भारत माता की जयश् इस नारे के इतिहास पर नज़र डालें तो मिलता है कि यह भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाला यही नारा था। भारत भूमि को जीवन का पालन करने वाली माता के रूप में रूपायित कर उसको बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए की गई कोशिशों में उसकी संतानों ने इस नारे का बार.बार प्रयोग किया था। भारत माता की वंदना करने वाली यह उक्ति हर उद्घोष के साथ स्वाधीनता संग्राम के सिपाहियों में नये उत्साह का संचार करती थी। आज भी इस नारे का प्रयोग राष्ट्रप्रेम या राष्ट्र निर्माण से जुड़े अवसरोंए कार्यक्रमों एवं आंदोलनों में किया जाता है।

पाठक आगे बढ़ने से पहले पैरा नंबर 3 की अंतिम दो पंक्तियों पर गौर करें जहां ये बात स्पष्ट है कि ये नारा तब अधिक इस्तेमाल हुआ है जब स्वाधीनता संग्राम सेनानी भारत को अंग्रेजों से आज़ाद कराने की मुहीम में बढ़.चढ़ के हिस्सा ले रहे थे। अब आज़ादी के 69 वर्षों के बाद अचानक वन्दे मातरम और भारत माता की जय का उद्घोष इस बात का प्रतीक है कि सोशल मीडिया की सीढ़ियां चढ़ते हुए हम आइडेंटिटी क्राइसिस का शिकार हुए जा रहे हैं। ये आइडेंटिटी क्राइसिस ही हैं जो हमें मुख्य मुद्दों से भटकाकर इस पर उलझाए हुए हैं। वर्तमान परिस्थितियों में देश का प्रत्येक व्यक्ति अपने को देशभक्त साबित करने में लगा हुआ हैद्य हम जिस जन्म देने वाली मां के बेटे हैं क्या कभी खुद को उसका सच्चा बेटा साबित करने की कोशिश करते हैंए शायद नहीं। हां उस पर कोई आंच आये उससे पहले हम आगे खड़े मिलते हैं। ठीक ऐसा ही है हमारा प्यारा भारत देश और भारत माता। हमें देश भक्ति का ढिंढोरा पीटने या ढकोसला करने की क्या जरूरत आन पड़ी। दरअसल यह सब उन नेताओं की नेतागीरी चमकाने और सुर्खियों में रहने की झूठी बिसात है जिसमें आम जनता आंख मूंदकर चलने वाला मोहरा बन जाती है। यदि आंखें बंद हैं तो धृतराष्ट्र क्यों बने हैं। महाभारत में धृतराष्ट्र को संजय ने आंखों देखी असली परिस्थिति सुनाई थी लेकिन क्या आज के नेता संजय की तरह भरोसे के लायक हैंण्ण्ण्इसका निर्णय तो आपको ही करना होगा वह भी आंख खोलकर।

अपनी बात के पक्ष में एक उदाहरण रखता हूं। असलीयत में एक दौड़ सी चल रही है। क्या बाबा रामदेवए क्या ओवैसी हर कोई अपनी तरफ़ से अपने बयानों से इस बात की कोशिश कर रहा है कि उसे नंबर वन का तमगा मिल जाए। आए दिन बयानबाजी हो रही है कभी ऑल इंडिया मजलिस.ए.इत्तेहादुल मुस्लिमीन के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने भारत माता की जय बोलने पर गलतबयानी की। तो इस पर दो हाथ आगे निकलते हुए बाबा रामदेव ने नहले पर दहला मार दिया। कुछ दिन पूर्व हरियाणा की एक सद्भावना रैली में उन्होंने ओवैसी के बयान पर प्रतिक्रिया दी और विवादों में फंस गए। ये कुछ उदाहरण थे जो ये बताने के लिए काफ़ी हैं कि राजनीतिज्ञ मूल मुद्दों को भूल जनता को दिग्भ्रमित कर अपने प्रभुत्त्व और अपने आप को स्थापित करने के लिए बयानबाजी करते रहेंगे और हम जैसी जनता उनके असल उद्देश्य को भूल सदैव की तरह वहीँ उलझे रहेंगे कि तुम नहीं असली और 69 साल पुराने राष्ट्रवादी हम हैं।

याद रखिये ये क्रम चल रहा है और चलता रहेगा। ध्यान रखने वाली बात ये हैं कि हमें वर्तमान में एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जिसकी जय दृ जयकार करते वक़्त देश के किसी भी व्यक्ति की ख़ुशी का ठिकाना ना रहे। साथ ही भारत मां का यह जयकारा किसी भी तरह की बंदिशों और पाबंदियों से मुक्त हो। कुछ ऐसा करना चाहिए ताकि लोग हमसे और हमारे जीवन से प्रेरणा लें और इस बात पर यकीन कर सकें कि सम्पूर्ण वसुंधरा हमारा घर है।

 

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