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आचरण श्रेष्ठ है

Guest Column | 16-May-2016 02:27:20 PM
     
  
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संस्कृत भाषा के एक ग्रंथ के कथन का आशय है कि जो मेरे लिए अनुकूल नहीं है वैसा आचरण हमें दूसरे के साथ नहीं करना चाहिए। बात सही है कि मन भर ज्ञान से तोला भर आचरण श्रेष्ठ है। ऐसा वेद की ऋचाएं, पौराणिक आख्यान, शास्त्रीय ग्रंथों का संदेश है। यह भाव भी पारिवारिक संस्कारों और आसपास के परिवेश पर निर्भर है। प्राय: घरों में माता-पिता दैनिक जीवन में झूठ का सहारा अपने हित-साधन के लिए लेते हैं। घर के छोटे लोग न चाहते हुए उसी तौर-तरीकों को अपनाने लगते हैं। अपने लाभ के लिए बोले गए एक असत्य-वचन से कई दिनों की पूजा-उपासना, यज्ञ-अनुष्ठान उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं जैसे बड़े परिश्रम से घड़े में एकत्र किए गए जल में कोई एक छेद कर दे, तो पूरा जल बह जाता है। ऐसा सारे धर्म-ग्रंथों में उल्लिखित है। कोई धर्म असत्य के मार्ग पर चलने की अनुमति नहीं देता है। यह बात बोया पेड़ बबूल का आम कहां से होय वाले मुहावरे से स्पष्ट हो जाती है कि जैसा कर्म वैसा फल। हम मंदिरों में जाते हैं। वहां प्रसाद मिलता है। बड़े जतन से उसे घर लाते हैं। इस उद्देश्य से सबको देते हैं कि उससे ईश्वरीय अनुकंपा मिलेगी, लेकिन सदाचार, सुसंस्कारों की बात पढ़कर और सुनकर हम भूल जाते हैं कि यह सब हमारे लिए नहीं औरों के लिए है। जहां भी देखने में आता है कि मन में कुछ है, लेकिन ऊपर से मानव चिकनी-चुपड़ी बातें कर लोगों को छलने की कोशिश में जी-जान से लगा है। पहले निकटता, फिर लालच के बाद अवसर पाकर लोगों को ठगने में लग जाता है। 1 ठगी, नकारात्मकता और तीन-तिकड़म की आयु कभी भी लंबी नहीं होती। उसे एक न एक दिन परास्त होना पड़ता है और फिर नकारात्मक जीवन जीने वाले व्यक्ति को जो पीड़ा होती है उसे वही जान सकता है। प्राय: लोग जीवन को कोसते नजर आते हैं। भगवान को दोष देते देखे जाते हैं। वक्त को गाली देते हैं, जबकि हम और हमारे लोग सुखी हैं तो यह हमारी सकारात्मक जीवन-शैली है और अगर दुखी हैं तो वह भी हमारी गलत जीवन-शैली की देन है। सदाचार का जीवन जिएंगे तो सम्मानित होंगे और धोखा, कृतघ्नता, झूठ-फरेब का रास्ता अपनाएंगे तो अपमानित होना ही पड़ेगा। अन्य किसी में यह ताकत नहीं है कि वह हमें दुख या सुख दे। सुख है तो वह भी हमारा और दुखी हैं तो वह भी हमारा अर्जित किया हुआ है।


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