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आओ, डर को दूर भगाएं

Guest Column | 19-May-2016 02:25:20 PM
     
  
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-रूद्र प्रताप दुबे 
 हिन्दू मान्यताओं को पढ़ते हुए 4 युगों से तो वाकिफ हो गया था। लेकिन उम्र के इस मुहाने पर आ कर ये सोच रहा हूँ कि युगों के अंदर भी कुछ कालों का बंटवारा होना चाहिए। जैसे वर्तमान में जो समय चल रहा है उसे कलयुग के अंदर  भयभीत काल का नाम देना चाहिए। हर कोई तो ही भयभीत है इस समय में। जो लोग काम पर लगे हैं वे भयभीत हैं कि उनकी नौकरी छूट जायेगी और जो काम पर नहीं लगे वे भयभीत हैं कि उनको कभी काम नहीं मिलेगा। स्त्रियाँ भयभीत हैं हिंसक पुरुषों से और पुरुष डरते हैं निर्भय स्त्रियों से। जिन्हें चिंता नहीं है भूख की वे भयभीत हैं लाजवाब खाने को खो देने को लेकर और जिन्हे खाने की चिंता है वो अगले दिन फिर से खाने से जुड़ी जद्दोजहद को लेकर भयभीत हैं।जब आम नागरिक डरते हैं बन्दूक लगी पुलिस से और राज्य सत्ताएं डरती हैं सेना सेण् सेना भयभीत है हथियारों की कमी से और हथियार भयभीत हैं युद्धों की कमी से। राजनेता भयभीत है क्यूंकि उनकी राजनीति अब लोगों को समझ में आने लगी है और जनता भयभीत है क्यूंकि उसे अब वास्तव में राजनीति समझ में आने लगी है। गर्व भयभीत है क्यूंकि उसका इस्तेमाल अब हर चीज़ों में होने लगा है और शर्म भयभीत है क्यूंकि वो विलुप्त ही होता जा रहा है। बापू भयभीत हैं क्यूंकि हर कोई बापू हुआ जा रहा है और समाजवाद भयभीत है कि आने वाली पीढ़ी उसे कभी समझ ही नहीं पायेगी। वर्तमान भयभीत है भविष्य से और भविष्य भयभीत रहता है हमेशा इतिहास से।

फासिस्ट भयभीत है अपनी ताकत खो देने को लेकर और लोकतंत्र भयभीत है इतिहास को कुरेदे जाने से। भाषा भयभीत है बोले जाने को लेकर और शब्द भयभीत हैं अपनी गरिमा को खोने से। एक अदद इंसान परिवार के बिना अपने जीवन की कल्पना से भयभीत है तो घर के दरवाजे बिना तालों के भयभीत हैं। अमीरों के लिए नींद की गोली के बिना रात का भय है तो गरीबों के लिए एक चादर के बिना रात का भय। एक को भीड़ का भय है तो एक को एकांत काए एक को जिंदगी रोज चलने का भय है तो एक को जिंदगी कभी रुक ना जाये उसका भय।

अपराधियों को पकडे जाने का भय है और ईमानदार को गलत आरोपों में फँस जाने का। अभिभावकों को बच्चे के एग्जाम का भय है और बच्चों को स्कूल जाने का। खिड़कियाँ बिना परदे के भयभीत हैं और घर अपने अकेलेपन से। सरकारें भयभीत हैं कि उनका भय कम हो रहा है और जनता भयभीत है कि उनकी अहमियत। भाव भयभीत है क्यूंकि उसकी विश्वसनीयता खतरे में है और भावनाएं इसलिए भयभीत है क्यूंकि उनकी कीमत दिन बा दिन गिरती जा रही है। महफिलें भयभीत हैं क्यूंकि संघर्ष बढ़ रहे हैं और दिन भयभीत हैं क्यूंकि रातें ज्यादा कीमती होती जा रही हैं। जाति भयभीत हैं क्यूंकि उनका दायरा सिमटता जा रहा है और धर्म भयभीत है क्यूंकि लोग बेख़ौफ़ अब उस पर भी सवाल उठा रहे हैं।

गम्भीरता से सोचने बैठें तो पाएंगे कि असल में भय हमेशा किसी इच्छा के आसपास पनपता है। जैसे अगर हम संसार के सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति बनना चाहते हैं तो फिर भय शुरू होता है। अगर ऐसा न हो सका तो क्या होगा वास्तव में ये भय इच्छाओं का ही बाइ.प्रोडक्ट होता है। अगर व्यक्ति में इच्छाएं ना हों तो उसे भय नहीं होगा लेकिन आज जो समय चल रहा हैं उसमे इच्छाएं उसी में नहीं होंगी जो कब्र के अंदर दफ़न होए इसलिए जो जिन्दा है वो भयभीत है और इसीलिए मुझे लगता है इस काल की कोई निर्धारित अवधि नहीं है। ये तभी खत्म होगा जब हम सभी लोग अपनी बेहिसाब इच्छाओं को नियंत्रित करना सीख लेंगे। सेनाओं को पूरी दुनिया जीतने की इच्छा छोड़ना पड़ेगा गाँव में रहने वालों को शहरी बनने की इच्छा को छोड़ना पड़ेगा धर्म के आला लोगों को धर्म से डराना छोड़ना होगाए सीमाओं को अपने बाड़ों से डरना छोड़ना होगाए पुरुषों को स्त्रियों से ऊपर रहने की इच्छा को छोड़ना पड़ेगा कुछ देशों को विश्व का सिरमौर बनने की इच्छा को छोड़ना पड़ेगा और कुछ लोगों को देश का सिरमौर बनने की इच्छा को छोड़ना पड़ेगा। इसलिए तमाम परेशानियों से बचने का एकमात्र इलाज़ है कि इच्छाओं को नियंत्रित किया जाए और जल्द ही इस भयभीत काल को अल्लाह हाफिज बोल दिया जाए।
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