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| 29-Oct-2016 03:40:23 PM
इस पर्व को दीपावली ही रहने दें, पटाखावली न बनाएं

  • इस पर्व को लेकर आज के कॉलम में दीपावली और स्वास्थ्य से जुड़ीं बातों पर प्रकाश डाल रहे हैं डॉ. सूर्यकान्त त्रिपाठी

 


सूर्यकांत त्रिपाठी
सूर्यकांत त्रिपाठी
(डॉक्‍टर, केजीएमयू)

दि राइजिंग न्‍यूज

प्रकाश और प्रसन्नता का त्‍यौहार दीपावली, नई उमंग लेकर आता है। हर उम्र और हर वर्ग के लोग साल भर से इस रौनक और धूमधाम वाले त्‍यौहार का बेसब्री से इन्तजार करते हैं। गर्मी के बाद अब मौसम, ठंड की गुलाबी रंगत ओढ़ने लगता है। ऐसे में नवदुर्गा पूजा की श्रद्धा और दशहरे का उत्साह दीपावली तक पूरा परवान चढ़ता है। पौराणिक पृष्ठभूमि के आलोक में इस दिन को मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम की अयोध्या वापसी से जोड़कर देखा जाता है। कहा जाता है कि चौदह साल के कठिन वनवास और अत्याचारी रावण को मारकर इसी दिन राम वापस अयोध्या पहुंचे थे और अयोध्यावासियों ने बड़ी धूमधाम से दीये जलाकर उनका स्वागत किया था।

 

आधुनिक विज्ञान और गूगल सर्च द्वारा यह प्रमाणित हो चुका है कि लंका से अयोध्या आने में 20-21 दिन का समय लगा। यही कारण है कि दशहरा के लगभग 20 दिन बाद ही दीपावली मनाई जाती है। समय के साथ इसका स्वरूप बदल चुका है। दीपावली से कई आर्थिक और मनोरंजक परम्पराएं भी जुड़ गईं। आतिशबाजी का बेतहाशा खेल इनमें सबसे प्रमुख है। आज हालत यह है कि दीपावली दीयों का कम बम और रॉकेट-पटाखों का त्यौहार ज्यादा लगता है। दीपावली के हफ्तों पहले से ही पटाखों की कानफोडू़ आवाजें लोगों के चैन और आराम भरे जीवन में भी खलल डालना शुरू कर देती हैं। दिल दहलाने वाले शोर के अलावा आतिशबाजी हमें दम घोटू जहरीला वायु प्रदूषण भी दे जाती है। आतिशबाजी से निकलने वाले धुएं में कैडमियम, बेरियम, रूबीडियम, स्ट्रांसियम और डाइआक्साइन जैसे जहरीले तत्व शामिल होते हैं। इनके धुएं में कार्बन डाईआक्साइड के अलावा कार्बन मोनोआक्साइड, सल्फर डाइ आक्साइड जैसी विषैली गैसें भी शामिल रहती हैं। आतिशबाजी से उपजे प्रदूषण का धूल-गुबार भारत के जल, थल और वायुमण्डल पर कहर बन कर टूटता है। वैज्ञानिकों के अनुसार महज थोड़े से मजेके लिए की जाने वाली यह भारी बेवकूफीहमारे वातावरण और पर्यावरण को बुरी तरह से प्रदूषित कर देती है। आतिशबाजी में होने वाले प्रमुख प्रदूषण हैं- जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण।

 

 

दीपावली के समय वातावरण में प्रदूषकों की मात्रा अचानक 200 फीसदी तक बढ़ जाती है जो काफी लम्बे समय तक अपना जहरीला असर यूं ही बरकरार रखती है। आतिशबाजी के निर्माण में कागज, प्लास्टिक और गत्ते का प्रयोग न सिर्फ बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटान का कारण बनता है बल्कि इसकी फैक्ट्रियां भी प्रदूषण फैलाने में बहुत आगे है। जहां तक पटाखों और आतिशबाजी से होने वाले नुकसान की बात करें तो उसके गम्भीरतम परिणामों में- गंभीर रूप से जलना, गंभीर चोटें, आंख की रोशनी जाना, दमा का दौरा पड़ना, दिल का दौरा पड़ना एवं स्थाई बहरापन, इत्यादि हो सकते हैं।

 

कई बार पटाखों के कारखानों या भंडार की जगह विस्फोट भी हो सकता है जिससे जान माल की हानि भी हो सकती हैं। ध्यान रहे यह विस्फोट, इसके निर्माण, परिवहन एवं भण्डारण की जगह ही नहीं, आपके घर में, आप के बच्चों के आस-पास कहीं भी हो सकता है। सोचिये क्या आतिशबाजी मनुष्य के जीवन से ज्यादा जरूरी है? ताजा मामला महाराष्ट्र के औरंगाबाद का है जहां पटाखा बाजार में आग लग गई। आग लगने से 200 से अधिक दुकानें खाक हो गईं।

 

पटाखों के जलने के उपरान्त बचे जहरीले अवशेष मिट्टी और अन्ततः पानी के जरिये हमारे भूमिगत जलश्रोतों, तालाबों और नदियों को प्रदूषित करते हैं। इससे होने वाले कानफोड़ू शोर और कम्पन हमारे सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंचा सकता है और कई लोगों में बहरेपन की भी इससे शिकायत हो जाती है। दीपावली के आसपास के दिनों में अस्पताल के इमरजेंसी वार्डों में आने वाला हर दूसरा तीसरा व्यक्ति पटाखे के चलते होने वाली दुर्घटनाओं का शिकार होता है। हाथ-पैर के जलने से लेकर समूचे पंजे उड़ने और हमेशा के लिए आंखों की रोशनी जाने की अनगिनत घटनाएं इस दौरान होती हैं।

 

आतिशबाजी के दौरान आसपास के लोगों की आंखों में जलन, चुभन, दम घुटने जैसी स्थिति सामान्य तौर पर देखी जा सकती है। इसके धुएं में पाये जाना वाला तत्व पोटैशियम परकोलेट, आपकी थायराइड ग्रन्थि को प्रभावित कर सकता है। दरअसल, यह रसायन, थायराइड ग्रन्थि द्वारा आयेडीन ग्रहण करने की क्षमता में कमी लाता है जोकि अन्ततः हाइपोथाइराडिज्म के रूप में परिलक्षित होती है। एक अन्य हानिकारक पदार्थ स्ट्रोन्सियम जन्म-जात विकृति, रक्ताल्पता और अस्थिमज्जा में नुकसान का सबब बन सकता है। खासतौर पर बच्चों की अस्थिमज्जा में प्रवेश कर स्ट्रान्सियम उनकी बढ़वार रोक सकता है। आतिशबाजी से उत्पन्न डाइ-ऑक्सिन एक जाना पहचाना कैन्सर कारक पदार्थ है। यह हार्मोन असंतुलन पैदा करने के साथ-साथ ग्लूकोज की मेंटाबोलिज्म में गड़बड़ी व त्वचा पर घाव जैसे दुष्प्रभाव भी डालता है।

 

आतिशबाजी से निकला बेरियम, मांशपेशियों की कमजोरी, डायरिया और शरीर में सुन्नपन जैसी स्थिति उत्पन्न कर सकता है। इसके अलावा व्यक्ति के पूरे शरीर को आतिशबाजी का धुआं किसी न किसी तरह प्रभावित करता है। हाई ब्लडप्रेशर, दिल के दौरे में बढ़ोतरी ऐसी कुछ दिक्कतें हैं जो इस खिलंदड़ के कारण होने वाली अनेक मौतों का कारण बनती हैं। इसके अन्य असरों में सिर दर्द, माइग्रेन, नाक, आंख और त्वचा की एलर्जी प्रमुख रूप शामिल है।

 

आतिशबाजी की चोट श्वसन तंत्र पर

भारत में तीन करोड़ लोग अस्थमा पीड़ित हैं। इसके अलावा तीन करोड़ लोगों को सीओपीडी या एम्फाइसीमा की बीमारी है। इन लोगों के लिए दरअसल दीपावली का समय एक दुःस्वप्न की भांति होता है। आतिशबाजी के दहन का धुआं ऐसी महीन धूल से सराबोर होता है जो बड़ी आसानी से हमारे फेफड़ों में प्रवेश कर सकती है। इससे खतरा यूं तो सभी को है लेकिन सांस के इन रोगियों के लिए यह प्राणघाती साबित हो सकता है। आतिशबाजी से निकले सूक्ष्म पदार्थ आसानी से फेफड़ों में घुसकर एलर्जिक रिएक्सन चालू कर देते हैं। इससे निकली अति प्रतिक्रियाशील ओजोन गैस फेफड़ों की सतह को घायल कर तत्काल भारी नुकसान पहुंचाती है। इससे निकले प्रदूषक, सांस के रोगियों के श्वसन मार्ग की सूजन बढ़ा देते हैं जिससे उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। उन्हे दमा का दौरा पड़ सकता है। दमा को इनहेलर की मदद से आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।यदि इनहेलर के इस्तेमाल से सुधार ना हो तो चिकित्सक का परमर्श अवश्य ले।

  • सांस के रोगी जहां तक हो घर के अन्दर रहें, पानी और पेय पदार्थों का भरपूर सेवन करें, तथा भाप लें। जहां वायु में प्रदूषकों का घनत्व ज्यादा हो वहां मास्क का प्रयोग करें।
  • दमा के रोगी अपनी दवाएं नियमित रूप से लें और जरूरत पड़ने पर तुरन्त अपने चिकित्सक से सलाह लें। इसके अतिरिक्त दीपावली के दौरान सफाई, धुलाई व पेंट के समय सांस के रोगी बचकर रहें क्योंकि इस धूल, गर्दा, व पेंट की खुशबू से सांस का दौरा पड़ सकता है।

 

हृदय रोगियों के लिए कुछ सावधानियां

  • हाई ब्लड प्रेशर और स्ट्रोक से ग्रस्त लोगों को पटाखों की ध्वनि को सुनने से दिल पर जोर पड़ता है। इससे हार्ट रेट बढ़ सकती है। इसलिए हृदय रोगियों को दूर से ही धमाकेदार आतिशबाजी को देखना चाहिए।
  • अगर चक्कर आने की समस्या या उलझन या घबराहट महसूस हो तो इस स्थिति में शीघ्र ही लेट जाए और फिर डॅाक्टर से परामर्श लेकर दवाएं लें या फिर डॉक्टर ने पहले से ही जो दवाएं इन लक्षणों के लिए बना रखी है, उन्हें लें
  • जिन लोगों ने कुछ दिन पहले एजियोप्लास्टी या बाइपास सर्जरी कराई है, उन्हें भी धमाकेदार पटाखों से दूर रहना चाहिए।

आंखों का बचाव

पटाखा आंख में लगने पर आंख को रगड़ना या मलना नहीं चाहिए, साथ ही आंख में धंसी चीज को निकालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। आंख जल जाने पर अपने हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोएं फिर जली आंख को पानी से दस मिनट तक धोए और शीघ्र-अतिशीघ्र डॉक्टर को दिखाएं।आतिशबाजी की रोशनी की तरफ न देंखे, हो सके तो प्रोटेक्टिव ग्लासेज पहनकर पटाखे चलाएं।

 

त्वचा संबंधित कुछ विशेष उपाय

  • ढीले-ढाले और सिन्थेटिक कपड़ों के स्थान पर चुस्त और मोटे-सूती कपड़े पहनें
  • बच्चों को पटाखों से दूर रखें और हमेशा उन पर नजर रखें
  • पटाखे जेब में न रखें क्योंकि ये बिना जलाए भी फट सकते हैं
  • जली हुई जगह पर से तुरंत कपड़ा हटाएं
  • जली हुई जगह पर ठंडा पानी डालें
  • जले स्थान पर मक्खन, चिकनाई,टेल्कम पाउडर या अन्य कोई चीज न लगाएं

कुछ अन्य सावधानियां और बचाव

सबसे बेहतर तो यह है कि दीपावली से पटाखों और आतिशबाजी को दूर रखा जाए अर्थात इस पावन पर्व को दीपावली ही रहने दें, पटाखावली न बनाएं

इसके अतिरिक्त

  • आतिशबाजी खुले स्थान पर सावधानी से चलाएं
  • धातु या शीशे पर रखकर पटाखे न जलाएं
  • ज्वलनशील चीजों के पास पटाखे न जलाएं
  • पानी या बालू भरी बाल्टी को आतिशबाजी वाले स्थान के पास रखें
  • फूलझंडी छुड़ाने के बाद इसके तार को इधर-उधर फेंकने के बजाय इसे बाल्टी में डालें
  • आतिशबाजी के स्थान पर इलेक्ट्रॉनिक आतिशबाजी का आनन्द लें। इससे शोर और वायु प्रदूषण से बचाव हो सकता है
  • कुछ आधुनिक आतिशबाजी बारूद के स्थान पर कम्प्रेस्ड हवा का प्रयोग होता है, जिससे प्रदूषण की मात्रा में कमी आती है
  • आतिशबाजी पर कड़ा सरकारी नियंत्रण हो खासतौर पर उन पटाखों पर जिनसे किसी भी किस्म के उल्लेखनीय प्रदूषण फैलने की संभावना हो। ज्ञात हो कि चीन द्वारा निर्मित आतिशबाजी ज्यादा विषाक्त व नुकसानदेह होती है
  • अपने पास पानी की बड़ी टंकी व बर्फ रखें जिससे जरूरत पड़ने पर प्राथमिक उपचार किया जा सके
  • डॉक्टर से पूछ कर ही दवा लें

डॉक्‍टर सूर्यकान्त त्रिपाठी

प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष,

पल्मोनरी मेडिसिन विभाग,

किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय,उ0प्र0, लखनऊ

 

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