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| 26-Jul-2016 06:08:56 PM
मायावती-दयाशंकर का अब थमना चाहिए घमासान

 


सुधांशु द्वेदी
सुधांशु द्वेदी
(भाजपा प्रवक्ता)

सुधांशु द्विवेदी

बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती के बारे में उत्तर प्रदेश के भाजपा नेता दयाशंकर सिंह के द्वारा की गई एक विवादास्पद टिप्पणी ने इतना भूचाल मचाया कि बसपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने चौक-चैराहों और गली-कूचों पर दयाशंकर के परिजनों को गालीगलौज करना शुरू कर दिया। साथ ही दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे के खिलाफ कानूनी कदम उठाने की भी तमाम कवायदों को अंजाम दिया जा रहा है।


इन सब परिस्थितियों के बीच सवाल यह है कि अपनी विवादास्पद बातों और हरकतों से सभ्य समाज को शर्मसार करने वाले ऐसे तथाकथित राजनेता किस हैसियत से खुद के जनमानस का हितैषी होने का दावा करते हैं। महज राजनीतिक फायदे एवं वोट बैंक की राजनीति के चलते एक दूसरे के मान-मर्दन पर उतारू ऐसे राजनेता किसी भी तरह की विवादास्पद बयानबाजी से पहले उन तमाम पहलुओं का आकलन क्यों नहीं करते जिसके आधार पर उनके खुद के ही बैकफुट पर पहुंचने व समाज के शर्मसार होने की संभावना दिखती हो। राजनीतिक बिरादरी के लोग अपने राजनीतिक फायदे के लिये स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों एवं मर्यादाओं का इस तरह से गला घोटेंगे, इसकी उम्मीद न तो जनमानस को रहती है और न ही समाज को।


फिर विवादास्पद बातों के बवंडर के सहारे खुद को चर्चा में लाने व अपनी राजनीतिक हैसियत बढ़ाने की फितरत पालने वाले नेता ऐसा क्यों नहीं सोचते कि वह जो कुछ भी कहने जा रहे हैं, उसका विस्फोटक असर तो होगा ही साथ ही उनकी गर्दन पर कानून की तलवार भी लटकने लगेगी। हम अगर उल्लेखित संदर्भ की ही बात करें तो चाहे मायावती हो या दयाशंकर सिंह, दोनों ही भारतीय राजनीति के आदर्श चेहरे नहीं हैं तथा उनकी इन अतिरंजित गतिविधियों से समाज में कोई क्रांति भी नहीं आने वाली है साथ ही जनमानस के एक झटके से वह इतिहास के कूड़ेदान में भी समा जाएंगे।


उनके बारे में चर्चा सिर्फ इसलिए हो रही है कि उन्होंने एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिये ऐसे तरीकों का इस्तेमाल किया है जो समाज को शर्मसार व मानवीय मूल्यों को बेजार करने वाले हैं। दयाशंकर सिंह ने मायावती के बारें में जब उक्त विवादास्पद टिप्पणी की थी तो पूरी भारतीय जनता पार्टी को बैकफुट पर आना पड़ गया था तथा खुद केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने मायावती से माफी मांगी थी साथ ही भाजपा से दयाशंकर सिंह को निष्कासित भी कर दिया गया था। बाद में बसपा नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने उक्त मामले में प्रतिक्रिया स्वरूप लानत-मलानत का ऐसा सिलसिला शुरू किया जो न तो लोकतंत्र में स्वीकार्य है और न ही समाज उसे बर्दाश्त कर सकता है।


बसपा नेताओं एवं कार्यकर्ताओं द्वारा फिर तो दयाशंकर की मां, बहन व बेटी तक को बख्शने की शराफत नहीं दिखाई गई। दयाशंकर सिंह की उक्त विवादास्पद टिप्पणी के बाद का समय जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है भाजपा एवं बसपा कार्यकर्ताओं के बीच जुबानी जंग भी तेज होती जा रही है। दोनों ही पक्षों ने एक दूसरे के खिलाफ मामला भी दर्ज कराया है। साथ ही दोनों ही पक्षों द्वारा दावा किया जा रहा है कि हम बेकसूर हैं। उम्मीद की जाती है कि दोनों ही पक्षों के खिलाफ काननू सम्मत ढंग से कानूनी कार्रवाई की जाएगी। वैसे देखा जाए तो बसपा हो या भाजपा, दोनों ही दलों की ऐसी अवांक्षनीय गतिविधियां सिर्फ उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों को मद्देनजर ही अंजाम दी जा रही हैं। वरना चाहे मायावती हो या भाजपा के नेता। अपने तमाम दावों के संदर्भ में उन्हें अपनी सूरत आइने में देखने की सख्त आवश्यकता है।


बेहतर होता कि दोनों पक्षों के दोषी लोगों के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई होती ताकि ऐसे विवादास्पद बयानों एवं कारनामों को अंजाम देने के मामले में कतिपय तत्वों के मन में कानून का खौफ पैदा होता। लेकिन शायद कानून के पहरुए भी राजनीतिक रंग में रंगे हुए हैं जो समूचे परिदृश्य को अपने लिये महज तमाशे के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। बात चाहे जो भी हो लेकिन मायावती व दयाशंकर के बीच का यह घमासान थमना ही चाहिये। साथ ही उन्हें ऐसी कानूनी चाबुक पडनी चाहिये जो यह सबक सिखाने के लिये काफी हो कि नेतागिरी की अपेक्षा मूल्यों एवं सरोकारों का महत्व समाज व देश में बहुत ज्यादा है तथा जो भी समाज में अपना दायरा तोडकर अतिवादी बनने की कोशिश करेगा उसे दंड का भागीदार बनना ही पड़ेगा।

 

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