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| 6-Jul-2016 08:58:09 PM
टीम मोदी का हिस्सा बनने के मायने

 



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सिकंदर अहमद


06 जुलाई।

कहा जाता है कि अगर कोई काम समर्पण, सहृदयता, संवेदनशीलता, सच्चाई के साथ किया जाए तो सफलता मिलने में शक नहीं है। संघ के प्रचारक और आम भाजपा कार्यकर्ता के रूप में राजनीतिक सफर शुरू करने वाले अनिल माधव दवे आज इसी कहावत के साक्षात प्रमाण हैं। व्यक्ति का भाग्य और पुरुषार्थ व्यक्ति को शिखर तक पहुंचाता है। मोदी कैबिनेट का चेहरा बन श्री दवे चंद वर्षों में अपनी योग्यता, चाल-चरित्र और निष्ठा के बल पर भारत की राजनीति का अहम हिस्सा बन गए हैं।



संघ की प्रयोगशाला कहे जाने वाले मध्यप्रदेश में 1999 में संघ के भोपाल विभाग प्रचारक के रूप में कार्य करने वाले श्री दवे का भाजपा की सक्रिय राजनीति में पदार्पण 2003 में हुआ। उनकी सक्रियता और समझ को संघ ने 1999 के सुश्री उमाभारती के लोकसभा चुनाव के समय ही पहचान लिया था। 2003 में 10 साल के दिग्विजय सिंह के शासन को उखाड़ फैंकने के लिये भाजपा की जो मुख्य टीम बनी थी उसमें श्री दवे का रोल एक्शन कैप्टन के रूप में था। 



श्री दवे की नई पहचान जावली के रूप में बनी उन्होंने तात्कालिक मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को बंटाढार का नाम देकर अपने चिंतन और दूरदृष्टि का परिचय दिया था। प्रदेश के पिछले छह चुनावों में अपने प्रबंधन से उन्होंने न सिर्फ भाजपा बल्कि विपक्षी दलों को भी आश्चर्यचकित किया। राजनीतिक मोर्चे पर प्रदेश से कांग्रेस को उखाड़ फैंकने के बाद सत्ता में रहते हुए दो बार वापस दिलाने में भी श्री दवे की भूमिका अहम रही। उन्होंने हर बार अपनी विलक्षण और सकारात्मक सोच को जीत में बदला है।



अनिल माधव दवे की गिनती ऐसे चिंतक और विचारक के रूप में होती है जिन्होंने खुद तो कभी चुनाव नहीं लड़ा लेकिन माइक्रो मैनेजमेंट के दम पर कइयों को चुनाव जिताकर विधायक, सांसद व महापौर बनवाने में बड़ी भूमिका निभाई। संघ के स्वयंसेवक से भाजपा में जुडऩे वाले श्री दवे को मध्यप्रदेश भाजपा की रणनीति में थिंक टैंक भी कहा जाता है। उन्होंने अपनी विचारधारा और सिद्धांत को अपनी पुस्तकों के माध्यम से कई बार प्रकट किया। उनकी पुस्तकें सर्जन से विसर्जन, चंद्रशेखर आजाद, संभलकर रहना घर में छुपे गद्दारों से, शताब्दी के पांच काले पन्ने, नर्मदा समग्र, समग्र ग्राम विकास, अमरकंटक टू अमरकंटक उनकी स्पष्ट सोच को सामने रखती हैं। 



मध्यप्रदेश की जीवन रेखा नर्मदा नदी के तट पर नदी महोत्सव शुरू कर नदी का घर बनाने वाले श्री दवे अनेक विशाल और अविस्मरणीय आयोजनों के भी मुखिया रहे हैं। भोपाल के जम्बूरी मैदान में लाखों भाजपा कार्यकर्ताओं का कई बार सफल कुंभ, लाल परेड मैदान पर अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन से लेकर सिंहस्थ के दौरान निनौरा में वैचारिक महाकुंभ का आयोजन कर अपनी क्षमता का परिचय उन्होंने दिया है। संघ की पृष्ठभूमि से निकलने वाले श्री दवे ने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को हर मोर्चे और मंच पर साबित किया है। प्रदेश में सत्ता और संगठन का नेतृत्व कई बार बदलता रहा लेकिन वे शीर्ष नेतृत्व के निर्देश पर समन्वय की राजनीति करते रहे। कई बार वे देश की राजनीति में उपेक्षा का शिकार भी बने। लेकिन कभी हड़बड़ाहट नहीं की, उत्तेजना नहीं दिखाई, कभी  पार्टी विरोधी या नेता विरोधी बयान नहीं दिया। देर से ही सही लेकिन आज उनकी तपस्या का परिणाम सामने है। 



मोदी-शाह के युग में जनअभियान परिषद को पीछे छोड़ अब वे भारत वर्ष के समाज कल्याण में जुटेंगे। श्री दवे का कल जन्मदिन है, कल वे 60 वर्ष के हो जायेंगे। भाजपा फार्मूला +75 के हिसाब से अभी उन्हें और पन्द्रह साल सक्रिय रहना है। यात्रा अभी अनंत है। सोपान अभी और हैं। मंजिलों के आयाम भी अनेक हैं। यह भी तय है कि आगे की यात्रा जिम्मेदारी वाली व कठिन होगी। अधिक तीव्रता और प्रतिस्पर्धात्मक होगी। जिस पद के वे हकदार थे वह उन्हें सम्मान के साथ मिला है। अब श्री दवे को अपनी नई पारी में तमाम जीवंत मुद्दों पर अपनी समग्र सोच के बल पर भारत की अस्मिता और एकता के लिये एकाग्र होकर देशहित में कार्य करना होगा। स्वप्नदृष्टा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संकल्प को श्रेष्ठतर रणनीति से जमीनी हकीकत में बदलना होगा। अब देश को होंगे दवे के दिव्य दर्शन।


 

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