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| 1-May-2016 02:42:20 PM
फिर भी कठिन है डगर विपक्षी एकता की

 



(गुमनाम)
-राजेंद्र शर्मा

वैसे तो चुनाव के सीजन में विपक्षी एकता की चर्चा शुरु हो ही जाती है। अचरज नहीं कि अप्रैल-मई में होने जा रहे पांच विधानसभाओं के चुनावों की पूर्व-संध्या में विपक्षी एकता के चर्चों और प्रयासों ने जोर पकड़ा है। लेकिनविधानसभाई चुनावों में मौजूदा चक्र की अपनी ही विशिष्टड्ढता हैजो शुरु होने के बावजूद इस चर्चा को सीमित करती है। 

हालांकिइन पांच राज्यों में देश की संसद के प्रतिनिधि सदन की कुल सीटों की चौथाई से थोड़ा ही कम हिस्सा आता है। इसके बावजूद,इन राज्यों की ठोस राजनीतिक सच्चाइयां इन चुनावों में किसी एक ओर कम से कम प्रत्यक्ष वृहत्तर राजनीतिक अर्थ को खोजना मुश्किल बनाती हैं। उल्टे इन चुनावों की एक प्रमुख सामान्य राजनीतिक विशेषता ही यह लगती है कि अपवादस्वरूप असम को छोडक़रशेष चार राज्यों में केंद्र में सत्ताधारी भाजपा तथा उसके गठजोड़एनडीए की चुनाव में कोई उपस्थित तक बड़ी मुश्किल से दर्ज होने जा रही है। चार राज्यों में तो केंद्र मेें सत्तारूढ़ भाजपाविधानसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए ही संघर्ष कर रही होगी। अचरज नहीं कि इन राज्यों में चुनावी एकताविभाजन के केंद्र में कुछ और ही प्रश्न हैं। केरल में सीपीएम के नेतृत्ववाले एलडीएफ तथा कांग्रेस के नेतृत्ववाले यूडीएफ के बीच ध्रुवीकरण कायम हैजो दोनों ही केंद्र में सत्ता में बैठे एनडीए के खिलाफ हैं। इसके उलट तमिलनाडु में मुख्य विभाजन अन्नाद्रमुक और द्रमुक के बीच हैजिनमें से किसी का भी केंद्र में सत्ताधारी एनडीए से प्रेम या बैर का सीधा नाता नहीं है। बंगाल में मुख्य धु्रवीकरण तो अब भी सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और वाम मोर्चा के बीच ही हैफिर भी लगातार 34साल के वाम मोर्चा शासन के बाद पिछली बार सत्ता आई तृणमूल कांग्रेस ने इस राज्य पर जैसा निरंकुश शासन थोपा हैउसने सबसे बढक़र राज्य में जनतंत्र की बहाली के लिएकिसी जमाने में एक-दूसरे की धुरविरोधी रही सीपीएम और कांग्रेस कोसाझा दुश्मन के खिलाफ वोट के बंटवारे से बचने के प्रयास करने के लिए तैयार कर लिया है। बहरहालअसम में स्थिति इन राज्यों से भिन्न हैजहां सत्तारूढ़ कांग्रेस से सत्ता छीनने की गंभीर कोशिश करते हुए भाजपा ने एक ओर असम गणपरिषद और दूसरी ओर बोडो राजनीतिक पार्टी के साथ गठबंधन किया है। भाजपा की इस कोशिश की गंभीरता इस तथ्य से और भी बढ़ जाती है कि 2014 के आम चुनाव में भाजपा ने अकेले हीइस राज्य से लोकसभाई सीटों के बहुमत पर कब्जा नहीं किया थाआधे से ज्यादा विधानसभाई क्षेत्रों में बढ़त भी दर्ज कराई थी।

2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की अभूतपूर्व जीत के बावजूददेश की राजनीति की बहु-ध्रुवीयता खत्म होना तो दूरउसमें शायद ही कोई कमी आई होगी। अगर यह सच है कि सत्ताधारी पार्टी ने एक-तिहाई से कम वोट के बल पर पूर्ण बहुमत हासिल किया थातो यह भी तय है कि शेष दो-तिहाई वोट का जितना बड़ा हिस्सा मुख्य विपक्षी कांग्रेस के हाथ रहा थाउससे बड़ा हिस्सा अन्य विपक्षी पार्टियों के हिस्से में गया था। इसमें इतना और जोड़ लिया जाए कि केंद्र में सत्ता में आने के बाद से भाजपाइन पार्टियों में से कुछ के साथ खासतौर पर राज्यसभा के लिए उसकी तरह-तरह की सौदेबाजी को अगर छोड़ दें तोअपनी कतारबंदी को बढ़ाने  में नाकाम ही रही है। उल्टे तमिलनाडु समेत आम चुनाव के समय के उसके कई सहयोगी उससे दूर ही छिटके हैं। दूसरे शब्दों में यह एक वस्तुगत राजनीतिक सच्चाई है कि आम चुनाव में भी जनमत का जितना हिस्सा मौजूदा सत्ताधारी गठजोड़ को मिला था,उससे दुगुने का प्रतिनिधित्व देश की अन्य राजनीतिक पार्टियां करती थीं और आम चुनाव के बाद से यह हिस्सा कुछ न कुछ बढ़ा ही है। जाहिर है कि इसी सच्चाई का दूसरा पक्षजिसकी कुछ झलक विधानसभाई चुनाव के मौजूदा चक्र में भी देखी जा सकती हैइस प्रतिनिधित्व का अनेकानेक पार्टियों-गठबंधनों के बीच बंटा होना है।

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