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साशा सौवीर

साशा सौवीर
(आउटपुट हेड, दि राइजिंग न्यूज)

सवाल तीन तलाक का तो था ही नहीं, सवाल था महिलाओं की आजादी का। तो क्‍या मिल गई मुस्लिम औरतों को आजादी?

पुरुष, जिनको महिलाओं की जिंदगी नर्क बनानी है वे बनाते ही रहेंगे। जीवन भर उनकी छाती पर मूंग दलते ही रहेंगे, जब तक महिलाएं थोड़ा सी हिम्‍मत कर के विरोध न जताएं। अगर औरतों, तुम जरा हिम्‍मत जुटाकर खुद के साथ दिन रात होते दुराचारों तक को नहीं रोक सकती तो माफ करना, इस आजादी उर्फ तीन तलाक वाले फैसले से तुम्‍हारा कोई भला नहीं होगा। जैसा पहले कहा, सवाल महज तीन तलाक का नहीं है। सवाल आपके ज्ञान का है। यह तीन तलाक तो तीन महीने में दी जाने वाली एक प्रक्रिया है, जिसको तीन सेकेंड में देकर तथाकथित “प्रथा” संबोधित किया गया। तो बात तो अक्षरता की ही है।

इस फैसले से खुश होने वालों जरा गौर फरमाइए…बेटी होती है तो पढ़ाइए लिखाइए, साक्षर बनाइए। वरना इस खुशी को भूल जाइए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला निश्चित ही स्‍वागतयोग्‍य है, लेकिन इसके साथ ही कई पहलुओं पर और विचार करने की जरूरत है। जब तक ये सहने वाली क्षमता औरतों में पलती रहेगी तब तक उनकी भला नहीं हो सकता। सहो...लेकिन सहने लायक परिस्थिति में। असहनीय स्थितियों में कतई नहीं। एक बार अपने लिए लड़ना सीख लिया तो यकीन मानो, हर फैसला तुम्‍हारें हक में होगा। किसी लॉ, किसी बोर्ड की जरूरत नहीं होगी तुम्‍हें।

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दि राइजिंग न्यूज़

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