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साशा सौवीर

साशा सौवीर
(आउटपुट हेड, दि राइजिंग न्यूज)

पिता खुदा की नेमत है,

पिता समझ का दरिया।  

पिता से है छांव सिर पर

वह राहत का जरिया।

यदि बात करूं जीवन में पिता की महत्‍ता की तो यह बेमानी होगी...क्‍योंकि यह संपूर्ण जीवन ही पिता है। पिता के बिना किसी के अस्तित्व की कल्पना कैसे।

18 जून को पितृ दिवस यानि फादर्स डे मनाया जाता है। हम-आप और सैकड़ों बेटे-बेटियां अपने पिता को खूबसूरत तोहफे देकर इस दिन को खुशी-खुशी मनाते हैं। पिता भी अपना फर्ज निभाते हुए ले जाएंगे कहीं डिनर या लंच पर, रविवार की छुट्टी जो है। आप अपने पिता की कुर्बानियां याद कर उन्‍हें पाने का फख्र करेंगे और वह आपको अपने लाल के रूप में पाकर खुशी से फूले नहीं समाएंगे। ऐसे भावनात्‍मक रूप से मन जाएगा फादर्स डे।

यही होता है अमूमन। लेकिन चलिए, आपको नदी के दूसरे छोर पर ले चलते हैं। उस दुनिया में मेरे साथ चलिए जहां आज छोटे-बड़े, मासूम बच्चे, खासकर बच्चियां पापा शब्द को जुबां पर लाने को तरस रहे हैं। पापा, पिता, डैडी की अनन्त दुनिया सिर्फ एक शब्द तक सिमट गई है। अब तो पापा के ख्वाब भी धूमिल होने लगे हैं। ऐसी परिस्थितियों की वजहें कई हैं। पर आखिर फादर्स-डे सबका है, तो सिक्‍के के सिर्फ एक पहलू पर बात क्‍यों। चर्चा हो रही है तो दोनों की हो।

घर के पास ही एक लड़की रहती है। उसने अप‍ने पापा को बस देखा भर ही है, न कभी बात हुई और न आज तक उसे अपने पापा की गोद नसीब हुई। कैसी विडंबना है कि मंदिरों में पूजी जाने वाली देवियों के देश में बेटी पैदा होना श्राप जैसा है। उसके साथ भी यही हुआ। नानी ने उसे पाला। हमेशा से ही वह नानी के यहां रही। घर में न तो उसके नाना हैं और न ही कोई मामा। यानी पिता का स्‍नेह उसे कभी किसी रूप में नहीं मिला। कॉलोनी में किसी भी पिता-पुत्री को ललचाई और असहाय नजरों से देखना उसकी रोज की टीस का हिस्सा सा बन गया है। वह कोई अकेली ऐसा नहीं सोचती है। ऐसे बेटियों और बेटों की कोई कमी नहीं।

पितृसत्‍तात्‍मक समाज है तो यह धारणा ही बन चुकी है कि पुरुष जो चाहे कर सकता है। चाहे वह पत्‍नी को उसके पिता से मिलने की पाबंदी हो,बेटी पैदा होने पर उसे खुद से दूर कर देने की निष्‍ठुरता हो। अपनी ही बेटी संग बलात्‍कार करने की हिम्‍मत हो।  घर परिवार को दर-दर भटकाने का साहस”!  हो और तो और ससुर को पितातुल्‍य मानने वाली बहू का रेप करने का कृत्‍य भी।

यानि रूप चाहे जो हो, महिला केवल भोग्‍या है। 

फादर्स डे इनका भी तो है। ये कैसे मनाएं फादर्स डे, किसे दें फूल-तोहफे,किनके लिए पकाएं पकवान।

फादर्स डे पर इन निगाहों को भी तो है अपने पिता का इंतजार...

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