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जन्मदिन पर मिला बेगम अख्तर अवॉर्ड

  • संगीत के चलते परिवार में मिले खूब ताने


मिर्जा साबिर बेग

 



दि राइजिंग न्यूज

जाफर ज़ैदी

मशहूर गजल गायिका बेगम अख्तर की स्मृति पर संस्कृति विभाग की ओर से बेगम अख्तर अवॉर्ड से उरई के मिर्जा साबिर बेग को नवाजा गया। इस मौके पर जब उनसे बात की गई तो उन्होंने अपने संगीत के सफर के बारे में बातें साझा की।

 

उरई के रहने वाले 53 साल के मिर्जा साबिर बेग को भले ही देश विदेश में उनके बेहतरीन सुरों की बदौलत तमाम शोहरत मिली हो। लेकिन वह बुंदेलखंड के लोक संगीत के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। उनकी गायकी के बेतहरीन सफर के लिये उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से बेगम अख्तर अवॉर्ड से नवाजा गया है। इस दौरान जब उनसे बातचीत की गई तो उनके मन का गुब्‍बार निकल पड़ा।

 

बचपन से संगीत में दिलचस्पी रखने वाले मिर्जा साबिर बेग को संगीत के जुनून के चलते भले ही परिवार में लाख ताने मिले। लेकिन बड़े होने पर पारंपरिक बुंदेलखंडी गायन की उपेक्षा उन्हें बहुत खलती है। पिता मिर्जा बाबू बेग उन्हें पढ़ाई के साथ अपने आरामशीनआटा चक्की के कारखाने में लगाना चाहते थे। लेकिन संगीत के जुनून के चलते उनका मन मशीनी कारखाने में नहीं लगा। उन्होंने उरई के डीबीसी डिग्री कालेज से बीएससी की पढ़ाई की ओर पढ़ाई के साथ ही सुरों के सफर में महारत हासिल करते गए।

 

बचपन में अपने संगीत गुरु सुरेंद्र खरे और बड़े होने पर कैराना घराने के शास्त्रीय संगीतज्ञ नत्थू लाल से संगीत के गुर सीखे। उनकी गायकी की बदौलत उरई के प्रशंसकों ने उन्हें उरई का मोहम्मद रफी का खिताब दिया। यहीं से उनका मंचों पर सुरों का सफर शुरू हुआ और झांसी महोत्सवबुंदेलखंडी महोत्सव और जालौन महोत्सव में उन्हें सम्मान मिले। फिल्मों में भी उन्होंने हाथ आजमाये और बुंदेलखंड की देवियों मां मैहर देवी पर फिल्म में काम किया। काफी शोहरत मिली। इसके बाद जान सनम फिल्म में संगीत निर्देशन कर लोगों को अपने हुनर से रूबरू कराया। उनका सफर देश ही नहीं विदेशों में पहुंचा जो कतरदुबईदोहा और यूएई आदि देशों में तय होता रहा।

 

जन्मदिन पर उपहार है यह अवॉर्ड

मिर्जा साबिर बेग को 29 दिसम्बर को जब यह अवॉर्ड मिला तो वह 53 साल के होने के मौके पर इस अवॉर्ड को पाकर बेहद खुश हो गए। उन्होंने कहा कि जब यह अवॉर्ड मिला तब मेरा जन्मदिन था और यह गिफ्ट अमूल्य है। साबिर को हाल ही में समाजवादी पार्टी के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष भी बनाया गया है।

 

लोक कलाकारों की हो रही अनदेखी

बुंदेलखंड के पारंपरिक लोकगायन और नृत्य के विलुप्त होने के विषय पर वे  कहते हैं कि बुंदेलखंड ही नहीं पूरे देश में पारंपरिक गायन और नृत्य के कलाकारों की उपेक्षा की गई। आज बुंदेलखंड का राई नृत्यझांझियां टेसूदीवारी नृत्य और पारंपरिक गायन को गिने चुने लोग ही जानते हैं। इसके लिये न किसी सरकार ने पैरवी की और किसी निजी संस्थान ने देखा। पूरे बुंदेलखंड में दस कलाकारों को सरकार की ओर से पेंशन मिल रही है। ऐसे में लोक कलाकारों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।

 

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