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बूढ़ी-थकी आर्थिक अपराध शाखा

  • लंबित हैं 800 केस, नहीं निपटाए जा रहे हैं मामले
  • वित्तीय प्रकरणों की जांच में ही घोटाला



 

दि राइजिंग न्‍यूज

04 जनवरी, लखनऊ।

छात्रवृत्ति से लेकर सरकारी अनुदान और भुगतान में अनियमितता की जांच करने वाली एजेंसी ही थकी है। जी हां, बात आर्थिक अपराध शाखा की हो रही है। एक तरफ केंद्र सरकार कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राइक करने का दम भर ही है तो मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश बनाने का दम भर रहे हैं। मगर हकीकत उलट है। प्रदेश में आर्थिक अपराधों की जांच के लिए इकाई तो है लेकिन इसमें जो अधिकारी हैं वे बस सेवानिवृत्त होने के दिन गिन रहे हैं। यानी अपनी नौकरी के अंतिम पड़ाव पर हैं।


सरकार की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पुलिस में सेवानिवृत्ति के करीब पहुंचने वाले अधिकारियों को यहां तैनाती दे दी जाती है। यहां तैनात अधिकारियों की औसत आयु 56 वर्ष या इससे अधिक है। इसका असर जांच में पड़ रहा है। यहां पर करीब 800 से अधिक केस लंबित पड़े हैं। विभाग में तकनीक जानकारी न होने के कारण नए जांच अधिकारियों को काफी दिक्‍कतों का सामना करना पड़ रहा है। इकाई में कई विभागों की जांच हो रही है। पहले से ही लंबित पड़े केस के कारण जांच लंबी होती है। इंस्‍पेक्‍टरों को बेहतर तकनीकी जानकारी न होने के कारण आरोप सिद्ध होने में समय लग रहा है। इससे आरोपियों को मौज करने का पूरा समय भी मिल जाता है। कई बार जब जांच अंतिम पड़ाव पर पहुंचती है तब तक कई आरोपी घोटाले की रकम खा-पीकर दुनिया से ही जा चुके होते हैं।


22 अधिकारी

आर्थिक अपराध इकाई में लबित मामलों को देखते हुए 108 जांच अधिकारियों की जरूरत है लेकिन वर्तमान में केवल 22 जांच अधिकारी ही हैं। केस की जांच इंस्‍पेक्‍टर रैंक का अधिकारी करता है। पुलिस महानिदेशक जावीद अहमद से अधिकारियों की मांग की गई है। चुनाव के बाद इस समस्‍या के समाधान होने की उम्‍मीद की जा रही है।


तकनीकी जानकारी का अभाव

जांच अधिकारियों को बैंकिंग लेजर पढ़ने, डेबिड-क्रेडिट की जानकारी, अन्‍य अभिलेखों के विश्‍लेषण करने जैसी कई तकनीकी जानकारी होनी चाहिए। हालांकि ऐसी विशेषता न होने के कारण जांच में असर पड़ता है और अधिकारी को समस्‍याओं का सामना करना पड़ता है। हाल ही में कई ऐसे इंस्‍पेक्‍टर आ गए हैं जो ऐसी शब्‍दावली नहीं समझ पा रहे हैं।


लंबी चलती हैं जांचे

इकाई में विभिन्‍न विभागों में हुए फ्रॉड और गबन जैसे केस आते हैं। अधिकतर केसों में जांच अधिकारी को प्रदेश के कई जिलों में जाना होता है। एक-एक बिंदु की जांच और उसके विश्‍लेषण जैसी चीजों के चलते खुलासे में काफी समय लगता है। नाम न छापने की शर्त पर एक अधिकारी ने बताया कि जांच के घेरे में आए विभाग भी अपनी भूमिका का निर्वाहन ठीक ढंग से नहीं करते। यदि उनके विभाग के अभिलेखों की जांच करनी हो तो वह उसे देने में भी अनदेखी करते रहते हैं। कई-कई बार पत्राचार भी किया जाता है लेकिन उदासीनता ही हाथ आती है। अभिलेख न देने पर कानूनी कार्रवाई जैसी व्‍यवस्‍था न होने से जांच लंबी चलती है और मामले निपटाने में देरी होती है। 

 

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