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माया से बन रहे महामंडलेश्वर

  • अयोध्या में बनना चाहिए राममंदिर : देव्‍या गिरी
  • मंदिर मुद्दे पर भाजपा भी कर रही है राजनीति



 


दि राइजिंग न्‍यूज

अनुराग शुक्ल

27 जुलाई, लखनऊ।

गोस्‍वामी तुलसी दास जी ने कहा था कि, कलयुग समयुग आन नहिं जो नर कर विश्वास। यह सच साबित हो रहा है। कलयुग में संत की परिभाषा बदल गई है। किसी समय मोहमाया छोड़कर लोग सतसंगति में समय व्‍यतीत करते थे। अब माया एकत्र करने में जुटे रहते हैं। संत का असली मतलब भी यही था कि वह परिवार का त्याग करें, माया से दूर रहे। वह धर्म के लिए काम करेगा। लेकिन मौजूदा समय में संत की परिभाषा बदलने लगी है। संत बनने के लिए लोग पैसे भी देते हैं, जिसका खुलासा महामंडलेश्वर का पद पाने के लिए सच्चिदानन्द गिरी के मामले में हो चुका है। संत समाज की किरकिरी भी हो चुकी है। यह मामला तो खुल गया, लेकिन तमाम मामले ऐेसे हैं जिनका खुलासा आज तक नहीं हो पाया। वे संत आज भी बड़े ओहदे पर बैठे हैं। संत व समाज से जुड़ी इन्‍हीं खट्टी-मीठी बातों पर दि राइजिंग न्यूज ने मनकामेश्वर पीठ की पीठाधीश्वर महंत देव्या गिरी से बात की तो उन्होंने माना कि, संत समाज का बड़ा पद पाने के लिए लोग पैसे का इस्तेमाल कर रहे हैं। महंत देव्‍या गिरी ने तमाम सवालों का बहुत ही खरा-खरा जवाब दिया। अपनी बात प्रभावशाली तरीके से रखा।


संत समाज में लोग महामंडलेश्वर का ओहदा पाने के लिए रकम खर्च करते हैं। पैसों के दम पर बड़ा पद प्राप्त कल लेते हैं। आप का इस बारे में क्या कहना है?


असल में आज लोगों के पास पैसा बहुत है। उनके पास पैसा तो है, लेकिन समाज में सम्मान ‍नहीं मिलता है। अब वे सोचते हैं कि ऐसा काम हो जिससे समाज में सम्मान भी मिले और पैसा भी सुरक्षित रहे। इसलिए पैसे देकर संत महामंडलेश्वर के ओहदे तक पहुंच जाते हैं। रही बात उन संतों की जो इन पर मेहरबानी करते हैं तो उनकी भी क्या गलती। अपना अखाड़ा या पांत चलाने के लिए पैसे तो चाहिए ही। यही कारण है कि साधु भी माया के फेर में पड़ जाते हैं।


आप ने तो महामंडलेश्वर का पद छोड़ दिया था?

हां बड़े संत ने कहा था ‍कि अवध प्रांत का महामंडलेश्वर का पद तू ले ले। मैंने बहुत सोचा ‍फिर मना कर दिया। मीडिया में खबर आ गयी कि मैं महामंडलेश्वर बना दी गयी, लेकिन मैंने पद त्याग दिया था। संत ने कहा ‍कि तू पद ठुकरा रही है। इसे पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते है। लेकिन मैंने पद नहीं लिया।


क्या कारण था ‍कि आप ने महामंडलेश्वर का पद छोड़ ‍दिया?

हमने सोचा कि, वैसे ही एक महिला के लिए पीठाधीश्वर का पद ही बड़ी चुनौती है। साथ ही महामंडलेश्वर का अपना एक प्रोटोकॉल होता है, जिसका पालन करना ही होता है। मैं ठहरी लखनवी विरासत में रहने वाली। मुझे समाज में कहीं भी, किसी के साथ बैठना पड़ता है। प्रोटोकॉल का पालन करना संभव नहीं था। समाज में काम करना था इसलिए नहीं लिया पद।


पीठाधीश्वर की क्या चुनौती है?

मनकामेश्वर पीठ में पांच पीढि़यों के बाद मैं पहली महिला पीठाधीश्वर बनीं वास्तविकता यह ‍कि यह पद पुरुष समाज के लिए ही है। महिला होने के नाते मैंने महसूस किया कि पीठाधीश्वर के लिए पुर्वजों ने जो निश्चित किया ‍कि पुरुष बने तो ठीक था। तमाम चुनौतियों का सामना करना पड़ता है क्या-क्या बताऊं।


समाज की गिरावट में संत की भूमिका क्या हो सकती है ?

संत महत्वपूर्ण भूमिका ‍निभा सकते हैं। क्योंकि आज भी चाहे हिन्दू हो या मुसलमान। वे धर्म गुरु पर विश्वास करते हैं। वे काउंसलिंग करें। देखें कि क्या हो सकता है। हम लोग प्रयास करते हैं। सभी धर्मों के लोग बैठते हैं तो सोचते हैं कि क्या हो सकता है। प्रयास भी हो रहा है कि गिरावट को रोकने का।


अयोध्या विवाद में आप का नजरिया क्या है ?

नजरिया क्या, अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए। वहां राम का जन्म हुआ था यह सभी जानते हैं। हम ही नहीं वहां के मुसलमान आते हैं तो वे भी कहते हैं कि राम मंदिर बन जाए तो ठीक होगा। कारण यह है जबसे वह विवाद हुआ वहां का मुख्य व्यवसाय ही चौपट हो गया। मुसलमान कहते हैं कि मंदिर में चढ़ने वाली तमाम चीजें तो मुसलमान ही निर्मित करते थे। अगर मंदिर बन जाता तो वहां पर्यटन के साथ-साथ रोजगार के ढेर सारे अवसर निकलते।


क्या इस मामले में भाजपा राजनीति कर रही है?

भाजपा ही नहीं सभी दल राजनीति कर रहे हैं। सभी दलों के लिए अयोध्या एक मुद्दा है। जबतक राजनीति नहीं करेंगे तब तक उनका वोट बैंक कैसे सुरक्षित रहेगा। इसलिए भाजपा ही नहीं सभी दल राम और अयोध्या को लेकर राजनीति कर रहे हैं। इससे भाजपा अछूती नहीं है।


गोमती के सौन्दर्यीकरण से आप खुश हैं कि दुखी ?

खुश हूं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को बधाई कि उन्होंने गोमती को टेम्स की तरह सजाने की ठानी है। स्वच्छता पर भी काम होना चाहिए और हुआ भी है। जो हो रहा है। ठीक दिशा में जा रही है गोमती।


बाबा रामदेव या अन्य संत जो राजनीति में बढ़चढ़ कर भाग लेते हैं। क्या सोचती हैं आप। संतों को राजनीति में आना चाहिए या नहीं ?


क्यों नहीं आना चाहिए। समाज में जहां भी अच्छे लोग हैं वे राजनीति में जाएं तो बहुत अच्छा होगा। संत समाज के भी अच्छे लोगों को राजनीति ने आना आवश्यक है, लेकिन विवादित लोग राजनीति से दूर रहे तो बेहतर होगा।  


आप राजनीति में आना चाहती है कि नहीं ?

देखिए हमारा काम है लोगों की भावना को पहचानना और समाज के लिए काम करने का। रही बात राजनीति की तो अभी तो नहीं जाना चाहती हूं, लेकिन कोई मजबूरी हो जाये। जैसे कि समाज कहे कि आप की जरूरत है और आप को राजनीति में जाना ही होगा तो मना नहीं कर पाउंगी, क्योंकि जब पीठाधीश्वर बनीं तो ऐसी स्थिति हो गयी ‍कि मना नहीं कर पाई।

 

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