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Guest Column | 21-May-2016 02:29:20 PM
दिखावटी सक्रियता

 

 देश को दहलाने वाले दिल्ली के दुष्कर्म कांड के वक्त नाबालिग रहे अपराधी की रिहाई को लेकर जिस तरह कुछ लोग संसद के बाहर सक्रिय हुए उसी तरह संसद के भीतर भी। तीन साल तक निष्क्रियता दिखाने के बाद यकायक सक्रिय होने से कोई नतीजा नहीं निकलना था और आखिरकार ऐसा ही हुआ भी। उच्च न्यायालय के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भी यही कहा कि इस मामले में कुछ नहीं किया जा सकता। न्यायपालिका इस नतीजे पर तब भी पहुंचती जब जुवेनाइल जस्टिस एक्ट यानी किशोर न्याय कानून में संशोधन कर दिया गया होता, क्योंकि आपराधिक मामलों में कोई भी कानून पिछली तिथि से प्रभावी नहीं हो सकता था। बालिग हो चुके नाबालिग अपराधी को बाल सुधार गृह से रिहा होना ही था, लेकिन अगर उक्त कानून को दुरुस्त कर दिया गया होता तो आज देश में गम और गुस्से का माहौल नहीं होता। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का संज्ञान लेने और उस पर चर्चा करके किसी नतीजे पर पहुंचने के मामले में सबसे निराशाजनक रवैया राज्यसभा में राजनीतिक दलों ने प्रदर्शित किया। लोकसभा ने इस कानून में कई आवश्यक संशोधन करते हुए उसे इसी वर्ष मई में पारित कर दिया था। राज्यसभा में राजनीतिक दलों ने इस कानून पर प्राथमिकता के आधार पर विचार करने के बजाय उसे सदन की प्रवर समिति को भेजने पर जोर दिया। उच्च सदन के इस फैसले पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते, लेकिन किसी को यह बताना होगा कि इस सत्र में इस विधेयक पर चर्चा करने के बजाय नित-नए मुद्दों पर हंगामा करने को प्राथमिकता क्यों दी गई? 1 गत दिवस कुछ विपक्षी दलों ने इस पर खूब हंगामा मचाया कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट को चर्चा के लिए सूचीबद्ध क्यों नहीं किया गया, लेकिन जब उन्हें बताया गया कि यह पिछले दिनों कम से कम तीन बार-8,10 और 11 दिसंबर को चर्चा के लिए सूची में शामिल किया गया था तो फिर उनके पास कोई जवाब नहीं था। इन दिनों विपक्षी दलों ने संसद में हंगामा करने और कोई कामकाज न होने देने को प्राथमिकता प्रदान की है। यह संभव है कि अगले एक-दो दिनों में इस विधेयक पर चर्चा हो जाए और उसे पारित भी कर दिया जाए, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए इस सवाल का जवाब देना मुश्किल है कि वे तीन वर्ष तक क्या करते रहे? गत दिवस राज्यसभा में तीन विधेयकों को आनन-फानन पास कर दिया गया। इनमें से अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों पर अत्याचार रोकने संबंधी वह विधेयक भी है जिसको लेकर यह कहा जा रहा था कि इस पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता है। आखिर इस आवश्यकता की पूर्ति करने की जरूरत यकायक खत्म कैसे हो गई? यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि यदि दिल्ली दुष्कर्म कांड के गुनहगार की रिहाई न हुई होती तो संभवत: अभी भी जुवेनाइल जस्टिस एक्ट पर ध्यान नहीं दिया गया होता। यह बिल्कुल भी ठीक नहीं कि संसद में राजनीतिक दल जनभावनाओं की परवाह करते नहीं दिख रहे हैं। इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं हो सकती कि देश संसद के सही तरीके से चलने की प्रतीक्षा भी करता रहे और अपेक्षा भी, लेकिन संसद में राजनीतिक दल हंगामा करना पसंद करते रहें। संसद के इस सत्र और पिछले सत्र में कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों ने जिस तरह हंगामा करने पर ही अधिक जोर दिया उससे देश को यही संदेश जा रहा है कि संविधान की सबसे बड़ी संस्था में अहं और राजनीतिक संकीर्णता का प्रदर्शन ही अधिक होने लगा है। 
 

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