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Guest Column | 30-Jun-2016 12:49:51 PM
डॉक्‍टरों की निर्ममता के तीन नमूने


 

 


श्‍याम कुमार

लखनऊ के तीन बहुत बड़े सरकारी चिकित्सालयों में एक ही दिन डॉक्‍टरों का जो क्रूर चेहरा सामने आया, उससे सिद्ध होता है कि जब तक कर्तव्यविमुख एवं निर्मम डॉक्‍टरों पर कठोर दण्डात्मक कार्रवाई का चाबुक नहीं चलेगा, अस्पतालों में सुधार असंभव है। कुछ ह्रदयहीन डॉक्‍टरों की वजह से सम्पूर्ण डॉक्‍टर बिरादरी बदनाम हो रही है, जबकि सज्जन स्वभाव वाले डॉक्‍टर ही अधिक संख्या में हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जब तक निर्मम डॉक्‍टरों का कड़ा इलाज नहीं करेंगे, जनता को राहत हरगिज नहीं मिलेगी। यहां लखनऊ के तीन प्रतिष्ठित अस्पतालों का एक दिन का विवरण प्रस्तुत हैः- 


   

पहला दृश्टांत बलरामपुर अस्पताल का है, जिसके एक चिकित्सक की योग्यता, मधुर व्यवहार एवं प्रषासनिक क्षमता की दूर-दूर तक ख्याति फैली हुई है। वह हैं बलरामपुर अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राजीव लोचन। बलरामपुर अस्पताल में एक निदेशक डॉ. सुमतिशील शर्मा हुए हैं, जिनकी योग्यता, सज्जनता एवं प्रषासनिक क्षमता का पूरे उत्तर प्रदेश में कोई जोड़ नहीं था। यदि कोई सरकार उनकी योग्यता का लाभ उठाती तो उसका बेइंतहा कल्याण होता। डॉ. सुमतिशील शर्मा अवकाश-ग्रहण के बाद हलद्वानी चले गए और वहां निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं। बलरामपुर अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राजीव लोचन को डॉ. सुमतिशील शर्मा का प्रतिबिम्ब माना जाता है। उसी बलरामपुर अस्पताल में गत दिवस शर्मनाक घटना हुई। प्राप्त विवरण के अनुसार वहां एक बुजुर्ग महिला रामलली को तेज बुखार के कारण गंभीर हालत में अस्पताल के आकस्मिक(इमरजेंसी) वार्ड में भरती किया गया। अगले दिन मरीज को वार्ड नम्बर सात में शिफ्ट कर दिया गया। लेकिन वहां बेड नम्बर 30 पर भरती उस वृद्धा की हालत में सुधार नहीं हो रहा था। दिन में 11 बजे डॉ. एसएएम रिजवी, जो तुनकमिजाज स्वभाव के माने जाते हैं, वहां राउण्ड लेने आए तथा मरीज को देखे बगैर अपने कक्ष में बैठ गए। मरीज के घरवालों ने डॉ. रिजवी से मरीज की हालत बताते हुए उसे देखने को कहा तथा शिकायत की कि मरीज के रक्त के नमूने चार बार जांच के लिए भेजे जा चुके हैं, लेकिन एक की भी रिपोर्ट नहीं आई है। इस पर डॉ. रिजवी भड़क गए तथा वृद्धा मरीज की फाइल मंगाकर उसे डिस्चार्ज करने लगे। जब वृद्धा के बेटे-बेटी ने विरोध किया तो वार्ड में मौजूद स्टाफ कुर्सी उठाकर उन्हें मारने दौड़ा। मामले की जानकारी होने पर मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राजीव लोचन ने स्थिति को संभाला।   


    

कुछ माह पूर्व अत्यंत वरिष्‍ठ पत्रकार पीबी वर्मा बलरामपुर अस्पताल में भर्ती हुए थे। उनके पैर में गंभीर घाव हो गया था। संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान(पीजीआइ) में उनका प्लास्टिक सर्जरी विभाग में गलत इलाज हुआ। गलत इलाज होने से उनका घाव और अधिक बिगड़ गया। एक दिन डॉ. राजीव लोचन से भेंट होने पर पीबी वर्मा ने अपने घाव का जिक्र किया तो उन्होंने उन्हें बलरामपुर अस्पताल में भर्ती होने को कहा। पीबी वर्मा के पैर का घाव इतना बिगड़ गया था कि कैंसर का रूप लेने लगा था। बलरामपुर अस्पताल में डॉ. राजीव लोचन की निगरानी में उसका इलाज शुरू हुआ। पीबी वर्मा को सात महीने बलरामपुर अस्पताल में रहना पड़ा। डॉ. राजीव लोचन की योग्य निगरानी, सही इलाज तथा मरहम-पट्टी की कुशलता के लिए मशहूर कम्पाउंडर शैलेंद्र सिंह की देखभाल के फलस्वरूप पीबी वर्मा का घाव ठीक होने लगा। पीबी वर्मा डीलक्स प्राइवेट वार्ड में भरती थे। उनके घाव के ठीक होने में कुछ कसर बाकी थी, तभी बलरामपुर अस्पताल के निदेषक डॉ. प्रमोद कुमार नित्य उनके कक्ष में आकर उनको डिस्चार्ज होने को कहने लगे। जबकि तीन-मंजिले उक्त वार्ड के सभी कमरे प्रायः खाली पड़े रहते थे। डॉ. राजीव लोचन ने पीबी वर्मा को तभी डिस्चार्ज किया, जब उनका घाव पूरी तरह ठीक हो गया।



दूसरी घटना किंग जार्ज चिकित्सा विश्‍वविद्यालय (केजीएमयू) की है, जहां मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा भेजे एक दृष्टिबाधित पति-पत्नी को चार घंटे तक इधर से उधर दौड़ाया गया। कुशीनगर निवासी उक्त महिला स्तन-कैंसर से पीड़ित थी, जिसकी फरियाद पर मुख्यमंत्री ने उसे सिविल अस्पताल में भरती कराया। रोग की जटिलता पर सिविल अस्प्ताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ आरके ओझा ने अस्पताल की एम्बुलेंस से मरीज को किंग जार्ज चिकित्सा विष्वविद्यालय भेजा। वहां दृष्टिबाधित दम्पति को जनसम्पर्क अधिकारी कार्यालय द्वारा चिकित्सा अधीक्षक कार्यालय में भेजा गया, जहां से ट्रामा भेज दिया गया। वहां डॉक्‍टरों ने दूसरे दिन बाह्य-चिकित्सा(ओपीडी) में आने को कहा। दूसरे दिन वहां से डॉक्‍टरों ने उन्हें शताब्दी फेज-एक में भेज दिया। वहां से उन्हें शताब्दी फेज-दो में जाने को कहा गया। जब चिकित्सा विष्वविद्यालय के उच्च प्रशासन को मुख्यमंत्री द्वारा भेजे गए मामले की जानकारी हुई तो उस दृष्टिबाधित महिला को भर्ती किया गया।



तीसरी घटना संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान(पीजीआइ) की है, जहां डॉक्‍टरों की लापरवाही से एक मरीज की मौत हो गई। उक्त संस्थान में 24 घंटे सेवा के नाम पर एक निजी जांच-लैब संचालित हो रही है, जिसने एक मरीज की जांच कर उसे एचआइवी युक्त बताया। संस्थान की अपनी लैब में भी जांच के लिए रक्त भेजा गया था, जिसकी रिपोर्ट दूसरे दिन आई, जिसमें एचआइवी नहीं होने की बात कही गई। गलत रिपोर्ट एवं सही इलाज न मिलने से मरीज को इतना सदमा लगा कि 45 वर्षीय उस व्यक्ति की ह्रदयगति रुकने से मृत्यु हो गई।  

 

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