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| 21-Sep-2016 04:12:29 PM
मुलायम परिवार युद्ध में अर्धविराम कब तक?

 


राजनाथ सिंह “सूर्य”
राजनाथ सिंह “सूर्य”
(वरिष्ठ पत्रकार)

दि राइजिंग न्‍यूज

राजनाथ सिंह सूर्य

समाजवादी परिवार के गृहयुद्ध में अर्धविराम लगाने में सफलता के बाद पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की प्रधानमंत्री बन पाने की पीड़ा एक बार फिर से उभरकर सामने आई। विधानसभा के 2012 के निर्वाचन में भारी सफलता के बाद भाई शिवपाल यादव के परामर्श को न मानकर पुत्र अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने की गलती जिस रूप में मुलायम सिंह यादव ने प्रगट किया है उससे तो यही स्पष्ट होता है कि परिवार में अर्से से सुलग रही कलह का फूट पड़ना चाचा-भतीजे की महत्वाकांक्षा नहीं अपितु बाप बेटे के बीच बनी असहज का परिचायक है, शिवपाल बीच में उस फुटबॉल के समान है जो दोनों ओर से लात खाता है। 

इस अर्धविराम को मुलायम सिंह अपने प्रभुत्व के प्रभाव के रूप में भले देखें लेकिन सच तो यह है कि उनको किसी और से नहीं अपितु अपने पुत्र से ही अब चुनौती मिली है और इसका कारण न तो कोई घर के बाहर का व्यक्ति है और न किसी अन्य की महत्वाकांक्षा मुलायम सिंह यादव के अपने परिवारमें संतुलन बनाए रखने के लिए अखिलेश को बहकजाने से रोकने के लिए शिवपाल को मोहरे के रूप में उछाला गया। अखिलेश शिवपाल से टकरा गए, दोनों ने अपनी प्रतिष्ठा खोई है सम्बोधन की खाई को चौड़ा कर और लाभ उसे हुआ है। जिसके प्रभाव से इस कलह में सार्वजनिक अभिव्यक्ति के लिए सामने आए मुलायम सिंह के बगलगीर बर्खास्त मंत्री गायत्री प्रजापति रहे। अखिलेश और शिवपाल के बीच अर्धयुद्ध विराम की पटकथा को सार्वजनिक करने से पूर्व मुलायम सिंह यादव ने यह दावा सार्वजनिक कर दिया कि प्रजापति पुनः मंत्री अवश्य बनेंगे। इस पूरे प्रकरण में बर्खास्त दूसरे मंत्री राजकिशोर सिंह का संदर्भ लुप्त रहा जबकि सैफई दरबार का एक स्तम्भ रामगोपाल यादव-जो अर्से से कलह में पंचायत के मुखिया रहते थे, अपनी प्रासंगिकता खोते नजर आए। मुलायम सिंह ने समाजवादी पार्टी को सैफई यादवमें जिस ढंग से सीमित कर दिया है, उसमें प्रभुत्व और प्रभाव के लिए संघर्ष की अपरिहार्यता को टाला तो जा सकता है, अस्थायी विराम भी लगाया जा सकता है लेकिन निर्मूल नहीं किया जा सकता। महान नीतिकार कवि रहीम ने ठीक ही कहा था-

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ों चटकाय।

तोड़े से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय।

सैफई परिवार में इतनी गांठ पड़ चुकी है और इस स्थिति के लिए परिवार से पुत्रों के मोह में उनकी सिमटती गई आकांक्षा है। परिवार में संघर्ष का पहला सार्वजनिक निवारण हुआ 2017 के लिए उम्मीदवारों की पहली सूची में अपर्णा यादव के नाम न शामिल होने से। मुलायम सिंह ने दूसरे दिन स्वयं नाम की घोषणा की। अखिलेश के मित्रों को निकालने के बाद सैफई महोत्सव में उद्घाटन में उनका मुलायम सिंह के साथ मंच पर न होना दूसरी घटना। और घटनाक्रम का विकराल रूप 15 अगस्त को उन्हीं के द्वारा की गई यह अभिव्यक्ति कि पार्टी के लोग शिवपाल के खिलाफ साजिश कर रहे हैं। शिवपाल बाहर गए तो पार्टी ध्वस्त हो जाएगी। फिर जैसे उन्होंने बिना शिवपाल को विश्‍वास में लिए 2017 में अखिलेश को अध्यक्ष बनाया था। वैसे शिवपाल की वापसी कर दिया। परिवार में वही हो रहा है जो वे चाहते हैं लेकिन अब अवरोधों के साथ मुलायम सिंह यादव अपनी समाजवादीपार्टी के सर्वोच्च मान्यता प्राप्त होता।

1989 में जनता दल में फूट के बाद कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री के पद पर कायम रहने में सफल होने से बने। किसी अन्य नेता की छत्रछाया के बिना हैसियत पाने में मुलायम सिंह के लिए जो लोग सहायक बनें, उनमें से प्रायः सभी उनसे 1990 में अयोध्या कांड में सहमत न होते हुए भी साथ रहे। 1991 के चुनाव में धाराशायी होने के बाद भी उन्होंने साथ नहीं छोड़ा था। उस अवधि में उनके पोस्टरों पर न तो शिवपाल का चेहरा रहता था, न रामगोपाल का, न अमर सिंह का जो बिना उनके बोले ही दिल की बात समझ लेते हैं-और न अखिलेश का। जो चेहरे थे वे थे-रामशरण दास, बेनी प्रसाद वर्मा, रमाशंकर कौशिक, मोहम्मद आजम खां, भगवती सिंह, अवधेश प्रसाद आदि। पोस्टर पर तब से चेहरों में बदलाव होता गया। जनेश्वर मिश्र का चेहरा मृत्युपरान्त बना रहा, लेकिन 2012 के निर्वाचन के पूर्व शिवपाल के साथ-साथ रामगोपाल और अखिलेश यादव का चेहरा पोस्टर पर उभर आया। अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद कुछ समय तक यही चारों चेहरे चमकते रहे। फिर किसी से शिवपाल और किसी से रामगोपाल गायब होते रहे। गृहकलह में एक पक्षीय होने के कारण रामगोपाल ने अपनी जैसी फजीहत कराई है उससे अब उनके चेहरे  बने रहने पर विराम लग गया है और जिस बाहरीके रूप में अमर सिंह को उन्होंने चिन्हित किया था और बाहर का रास्ता दिखाने का माहौल बनाया था, उसे मुलायम सिंह यादव द्वारा संकट का साथी करार देकर और अधिक आन्तरिक पैठप्रदान कर दिया। समाजवादीवाहनों पर लाने वाले लघु फण्डों पर पहले एक मात्र मुलायम सिंह का चित्र रहता था, फिर अखिलेश का चित्र भी आ गया और कलह के फूट पड़ने के समय केवल अखिलेश के चित्र वाले झंडे लगे वाहनों की कतार लग गई। समाजवादी पार्टी के सैफईवादी पार्टी से भी सिमटकर मुलायम परिवारके हित टकराव में सिमट कर रह गई है। 

अखिलेश यादव इस सौतिया समीकरण से टकराने के कारण चाचा के साथ आर-पार की लड़ाई में पीछे हटने के लिए जिस प्रकार से विवश किए गए हैं, उसमें गायत्री प्रजापति के पुर्नस्‍थापना की अन्तर निहित कथा की चर्चा को महत्वहीन मानना, मूल कारण की अनदेखी था। मुलायम सिंह यादव राज सत्ता और सम्पदा के सहारे परिवार में जो संतुलन बनाए रखकर चलना चाहते थे, इस प्रकरण से यह स्पष्ट हो गया है कि यह अर्धयुद्ध विराम चाचा और भतीजे के बीच नहीं पिता और पुत्रों के बीच सम्बन्धों का अर्धविराम है। जिसकी इबारत अभी आगे लिखे जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। यदि 2017 के चुनाव आने तक दृष्टिपात से परे कारण उभरकर सामने आ जाए तो आश्‍चर्य नहीं होगा। इस तथ्य को संज्ञान में रखना आवश्यक है कि अखिलेश अपने परिवार के साथ कालीदास मार्ग पर रहते हैं और मुलायम सिंह अपने परिवारके साथ विक्रमादित्य मार्ग पर। दोनों मार्गों के बीच कोई विभाजक रेखा नहीं है क्योंकि उनकी पीठ आपस में मिली हुई है। रही मुलायम सिंह के प्रधानमंत्री न बन पाने के दर्द की बात, तो इसके लिए उनके अलावा दूसरा कोई उत्तरदायी नहीं है।

उन्होंने सदैव ध्रुवीकरण के अवसर को जिस ढंग से घात पहुंचाया है उससे उनकी विश्वसनीयता घटती गई। विहंग विधानसभा चुनाव के पूर्व महागठबंधन का अध्यक्ष पद पर आसीन किए जाने के बाद उन्होंने उससे जिस प्रकार किनारा कसा, यह उनके अवसर पर चूकने की अमरकथा का अंतिम कांड नहीं साबित होगा, भविष्य में बनने वाले किसी ध्रुवीकरण के लिए मुलायम सिंह ने अपने इस आचरण से विश्वसनीयता को सदा के लिए खो दिया है। अकेले दम पर उनके लिए उत्तर प्रदेश का दुर्ग बचाना संभव नहीं दिखाई पड़ रहा है, तो प्रधानमंत्री पद जैसे महादुर्ग पर कब्जे की टीस की बार-बार अभिव्यक्ति दिवास्वप्न से अधिक कुछ भी नहीं रह जाती। सत्ताधारियों की जिस स्वेच्छाचारिता के कारण उनका पतन होता रहा है, उसके स्व के आचरण के परिणाम कई बार भुगत चुके मुलायम सिंह यादव से अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने के बाद-उस प्रकार के आचरण पर विराम की अपेक्षा थी, लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश साढ़े चार मुख्यमंत्रियों में आधा वाला प्रभावयुक्त भावना को उन्होंने चार वर्षों में जिस प्रकार बार-बार अभिव्यक्त की है उससे अधिक और कौन जिम्मेदार हो सकता है। वर्तमान कलह में अर्धविराम लगाते हुए उन्होंने जो अभिव्यक्त की है, उससे अखिलेश यादव का छवि धूमिल हुई ही हुई हो, भले ही वे एक आज्ञाकारी पुत्र के रूप में इस प्रभाव को स्वीकार करने की अभिव्यक्त करे, लेकिन उनके स्वाभिमान को जो ठेस पहुंची है, वह डूबते जहाज पर और बोझ लादने वाला साबित हुआ है। इन साढ़े चार वर्षों में अखिलेश सरकार भ्रष्टाचारियों की पैरोकार, जातीयता के उभार, दबंगों के पैसार और सैफई परिवार के एकाधिकार के रूप में उभरी है, उस पर न्यायालयों की फटकार के निःप्रभावी रहने के स्वरूप ने, जनमानस को उसी प्रकार इस शासन से मुक्ति पाने के लिए व्याकुल कर दिया है जैसे 2012 में उसे मायावती के शासन से मुक्ति के लिए व्याकुल किया था। जब मुलायम सिंह यादव अपनी पहले की भूलों से सबक सीखने के लिए तैयार नहीं हो सके तो फिर उनका पुत्र उस विरासत को ढोने से मुक्ति कैसे पा सकेगा। पार्टी को जाति से गांव और परिवार से घनिष्ठ परिवार में सीमित करके उसके घनत्व का आणुवीकरण जिस प्रकार हुआ है उसका विस्फोट तो होना ही है। वर्तमान विराम विस्फोट की अगले कणों को जोड़ने का माध्यम बनेगा, इसमें संदेह नहीं है। क्योंकि जैसा कांग्रेस में दो फाड़ होने के पूर्व और जनता पार्टी के विघटन के समय युद्ध विराम होते रहे, सबकुछ ठीक है का दावा करते हुए दांव-पेंच जारी रही, वही स्थिति मुलायम परिवारकी बन चुकी है।

 

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