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| 25-Jul-2016 04:02:36 PM
शासन छोड़ सियासत में उलझे केजरीवाल

 


डॉ दिलीप अग्निहोत्री
डॉ दिलीप अग्निहोत्री
(वरिष्ठ टिप्पणीकार)

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

अरविन्द केजरीवाल ने चुनाव के पहले मोहल्ला समितियों के गठन और सीधे संवाद का वादा किया था। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ऐसा करना असंभव भी नहीं था, लेकिन भारी बहुमत से सरकार बनाने के बाद मोहल्ला समिति की अहमियत नहीं रही। नरेन्द्र मोदी की तर्ज पर उन्होंने टाक टू ए.के. कार्यक्रम शुरू किया। पहली बात तो यह कि इससे अरविन्द को संतुष्टि मिलनी थी। उन्हें इस माध्यम से मोदी की बराबरी का अनुभव हुआ होगा। दिन और समय भी बिल्कुल वही था।


लेकिन ऐसे कार्यक्रमों की मूल भावना को ही समझने में केजरीवाल असफल रहे। टॉक टू ए.के. में उन्होंने वही राजनीतिक बात कही जो हमेशा दोहराते हैं। इसमें नरेन्द्र मोदी के प्रति विद्वेष रहता है। दिल्ली की तुलना पाकिस्तान जैसे संबंधों से कर दी। इसके अलावा उन्होंने जिन मुद्दों पर हमला बोला वह भ्रष्टाचार और नियमानुसार कार्य न करने से जुड़े थे। इन पर केजरीवाल खुद जवाबदेह हैं। मोदी मन की बात में राजनीति की बात नहीं करते, अरविन्द राजनीति से हटकर बात नहीं कर सकते। यह बड़ा अन्तर है। अरविन्द केजरीवाल के उस प्रस्ताव का भी कहीं अता-पता नहीं है जिसमें उन्होंने भ्रष्ट कर्मचारियों की शिकायत एसएमएस से भेजने का आह्वान किया था। उनके अधिकार क्षेत्र वाले प्रशासन में किसी प्रकार का सुधार देखने को नहीं मिल रहा है।

 

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा और शीला दीक्षित ने मात्र एक-एक संसदीय सचिव बनाया था। इस विषय पर अरविन्द केजरीवाल की अलग ढंग की राजनीति देखिए, उहोंने इक्कीस संसदीय सचिव बना दिए। इतना ही नहीं जब सवाल उठे तो बेशर्मी से जवाब दिया। कहा कि ये इक्कीस विधायक जनसेवा कर रहे थे। इसलिए सचिव बनाया। अरविन्द के इस तर्क को अन्ना के आदर्शों की कसौटी पर देखें। क्या विधायकों को जनसेवा के लिए एक अतिरिक्त पद चाहिए। क्या विधायक रहते हुए वह जनसेवा नहीं कर सकते, क्या विधायक अस्पताल, सड़क, स्कूल आदि की व्यवस्था नहीं देख सकते।


डेढ़ वर्ष में आम आदमी के नौ विधायकों पर गंभीर आरोप लगे। इसके चलते इन्हें जेल की हवा खानी पड़ी। कोई महिला के उत्पीड़न का तो कोई छेड़छाड़ का आरोपी था। दो विधायकों पर जमीन सौदों में दबंगई के आरोप लगे। प्रत्येक आरोप पर आत्मचिंतन की जगह केजरीवाल सीधे प्रधानमंत्री पर निशाना लगा देते हैं। कहते हैं कि वह बदले की भावना से काम कर रहे हैं। केजरीवाल को देखना चाहिए कि उनका मोहल्ला समिति बनाने के दावे का क्या हुआ। आरोपी विधायकों की अपने ही मोहल्ले में छवि ठीक नहीं है।


आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल दावा चाहे जितना करें, लेकिन हकीकत यह है कि औरों से अलग दिखाने वाले सभी मुद्दे उनके हाथ से निकल चुके हैं। यहां तक कि राजनीति से गंदगी साफ करने का प्रतीक रूप उनका चुनाव चिन्ह भी अर्थ खो चुका। पार्टी की स्थापना के समय अरविन्द केजरीवाल ने कहा था कि झाड़ू उनकी विचारधारा को दर्शाएंगी। इसके माध्यम से वह साफ-सुथरी राजनीति को तरजीह देंगे, लेकिन राजनीति का ऐसा कोई दुर्गुण नहीं है, जो आप में मौजूद नहीं है। इन पर झाड़ू चलाने की बात तो दूर अरविन्द केजरीवाल अब भ्रष्टाचारियों के बचाव में खड़े नजर आते हैं। अपने जिस प्रधान सचिव राजेन्द्र कुमार को वह क्लीन चिट दे रहे थे, उनकी सच्चाई अब सामने आने लगी हैं।

सीबीआइ ने राजेन्द्र कुमार और अन्य आरोपियों को आमने-सामने बैठाकर पूंछताछ की। बताया जाता है कि सीबीआइ के पास मौजूद सबूतों को देखकर आरोपियों की हेकड़ी समाप्त हो गई। एक आरोपी अशोक कुमार ने स्वीकार किया कि वह राजेन्द्र कुमार के कहने पर रिश्वत की रकम वसूलता था। आप के एक विधायक नरेश यादव पर पंजाब में दंगा भड़काने का आरोप है। इस मामले में गिरफ्तार मुख्य आरोपी ने नरेश यादव से संबंध स्वीकार किए हैं। उसने धर्म विशेष के धर्म ग्रन्थ की बेअदबी मामले में नरेश यादव की भूमिका का पर्दाफाश किया। दंगा फैलाने के ये अकेले आरोपी नहीं हैं। इसके पहले दिल्ली में दो आप विधायकों पर दंगा फैलाने के आरोप लगे थे। वैसे भी आम आदमी पार्टी को वोट बैंक की राजनीति के परम्परागत तरीके अपनाने से कभी परहेज नहीं रहा। यह भी अन्ना हजारे के आदर्शों और नई राजनीति के दावों को रौंदने जैसा था।


दिल्ली चुनाव के पहले अरविन्द केजरीवाल दंगे के आरोपी मुस्लिम नेता से मीटिंग करते हैं, उसका समर्थन लेते हैं। पंजाब चुनाव से पहले अपने घोषणा पत्र में स्वर्ण मन्दिर का चित्र दिखाते हैं। यदि कोई पार्टी अपने चुनाव घोषणा पत्र में मन्दिर दिखा दे, तो वह तत्काल साम्प्रदायिक घोषित हो जाती है। ऐसे में आप को साम्प्रदायिक क्यों नहीं मानना चाहिए। इतना ही नहीं वोट बैंक की राजनीति से इसके नेता स्वर्ण मंदिर और गुरू ग्रंथ साहब का सम्मान भी भुला बैठे। राजनीतिक पार्टियों का चुनावी घोषणा पत्र किसी धर्म ग्रन्थ की भांति नहीं हो सकता। आप नेता इस तथ्य को बखूबी समझते हैं। दिल्ली चुनाव में जारी घोषणा पत्र की सच्चाई वह समझते थे। इसमें उन विषयों पर भी वादे किए गए जो दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते ही नहीं थे। इसके अलावा इतने वादे कर दिए जिन्हें पूरा करने में राष्ट्रीय बजट भी कम पड़ जाए। इसके बाद भी पंजाब में अपने घोषणा पत्र की गुरुग्रन्थ साहब से तुलना अपराध से कम नहीं। वोट बैंक की राजनीति में किसी पार्टी को इस हद तक नहीं जाना चाहिए।


हकीकत यह है कि दिल्ली सरकार उन विषयों पर गंभीर नहीं है, जो उसके अधिकार क्षेत्र में है। वह उन पर हल्ला मचाती है, जो अधिकार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को मिल नहीं सकते। मतलब साफ है वह शासन की जगह केवल राजनीति कर रहे हैं। वह विधेयकों पर प्रक्रिया का पालन नहीं करते। जब प्रक्रिया पालन को कहा जाता तो हंगामा करते हैं कि विधेयक लौटा दिए गए। ऐसे में यह क्यों न माना जाए कि केजरीवाल जानबूझ कर प्रक्रिया का पालन नहीं करते, जिससे विधेयक लौटे और उन्हें राजनीति करने का अवसर मिले। अक्सर केजरीवाल सरकार को कोर्ट में भी मुंह की खानी पड़ती है। दिल्ली के उपराज्यपाल को विशेष अधिकार संविधान के अनुच्छेद 239 के तहत मिले है। इसमें यह भी उल्लेख है कि भूमि, कानून व्यवस्था और पुलिस दिल्ली सरकार के अधीन नहीं है। 


फिर भी दिल्ली सरकार के पास कार्यों की कमी नहीं, लेकिन केजरीवाल उन्हीं मुद्दों पर फोकस रखते हैं जो संविधान के तहत मान्य नहीं है। उन्हें सुप्रीम कोर्ट फटकार लगाती है। दिल्ली की केजरीवाल सरकार का कहना था कि अनुच्छेद 131 के तहत केन्द्र व दिल्ली के अधिकारों का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तय करे, जबकि दस मामले हाईकोर्ट में हैं। सुप्रीम कोर्ट इस दलील से सहमत नहीं कि हाईकोर्ट दिल्ली सरकार के मामलों की सुनवाई न करे। जाहिर है केजरीवाल अन्ना के आदर्शों को बहुत पीछे छोड़ चुके हैं। प्रशासनिक विजन न होने के कारण वह उपलब्ध कार्यों व अधिकारों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। जो नहीं हैं, उसके लिए हंगामा कर रहे हैं।  

 

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